Monday, February 20, 2012

Rudrashtakam - श्रीरुद्राष्टकम्




Rudrashtakam – Eightfold Hymn of praise to please Lord Shiva

श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो हं॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो॥8॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥

 

 Meaning:

I bow to the Ruler of the Universe, whose very form is Liberation,the omnipotent and all pervading Brahma, manifest as the Vedas. I worship Shiva, shining in his own glory, without physical qualities,Undifferentiated, desireless, all pervading sky of consciousness and wearing the sky itself as His garment. ||1||

I bow to the supreme Lord who is the formless source of “OM” The Self of All, transcending all conditions and states,
Beyond speech, understanding and sense perception, Awe-full, but gracious, the ruler of Kailash, Devourer of Death, the immortal abode of all virtues. ||2||

I worship Shankara, whose form is white as the Himalyan snow, Radiant with the beauty of countless Cupids, Whose head sparkles with the Ganga. With crescent moon adorning his brow and snakes coiling his neck ||3||

The beloved Lord of All, with shimmering pendants hanging from his ears, Beautiful eyebrows and large eyes, Full of Mercy with a cheerful countenance and a blue speck on his throat. ||4||

I worship Shankara, Bhavani’s husband,The fierce, exalted, luminous supreme Lord.Indivisible, unborn and radiant with the glory of a million suns; Who, holding a trident, tears out the root of the three-fold suffering,And who is reached only through Love. ||5||

You who are without parts, ever blessed, The cause of universal destruction at the end of each round of creation, A source of perpetual delight to the pure of heart,Slayer of the demon, Tripura, consciousness and bliss personified,
Dispeller of delusion Have mercy on me, foe of Lust. ||6||

Oh Lord of Uma, so long as you are not worshipped there is no happiness, peace or freedom from suffering in this world or the next. You who dwell in the hearts of all living beings, and in whom all beings have their existence, Have mercy on me, Lord. ||7||

I don’t know yoga, prayer or rituals, But everywhere and at every moment, I bow to you, Shambhu! Protect me my Lord, miserable and afflicted as I am with the sufferings of birth, old-age and death. ||8||

This eightfold hymn of praise was sung by the Brahman to please Shankara. Shambhu will be pleased with whomever heartfully recites it.

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Shiva Rudrashtakam Audio Video



महामृत्युंजय कवच


महामृत्युंजय कवच का पाठ करने से जपकर्ता की देह सुरक्षित होती है। जिस प्रकार सैनिक की रक्षा उसके द्वारा पहना गया कवच करता है उसी प्रकार साधक की रक्षा यह कवच करता है। इस कवच को लिखकर गले में धारण करने से शत्रु परास्त होता है। इसका प्रातः, दोपहर व सायं तीनों काल में जप करने से सभी सुख प्राप्त होते हैं। इसके धारण मात्र से किसी शत्रु द्वारा कराए गए तांत्रिक अभिचारों का अंत हो जाता है। धन के इच्छुक को धन, संतान के इच्छुक को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

भैरव उवाच
श्रृणुष्व परमेशानि कवचं मन्मुखोदितम्‌ ।
महामृत्युंजयाख्यस्य न देयं परमाद्भुतम्‌  ।।

यं धृत्वा यं पठित्वा च श्रुत्वा च कवचोत्तमम्‌ ।
त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सुखितोऽस्मि महेश्वरि  ।।

तदेववर्णयिष्यामि तव प्रीत्यावरानने ।
तथापि परमं तत्वं न दातव्यं दुरात्मने  ।।


बाई हाथ (Right Hand) मे जल लेकर तम्बपात्र मे जल छोडे !
 विनियोगः
अस्य श्री महामृत्युंजयकवचस्य भैरव ऋषिः ।
गायत्रीछन्दः मृत्युंजयरुद्रो महादेवो देवता  ।।
ॐ बीजं जूं शक्तिः। सः कीलकम्‌।
हौमितितत्वं व चतुर्वर्गसाधने विनियोगः  ।।

चंद्रमंडलमध्यस्थे रुद्रभाले विचिन्त्यते ।
तत्रस्थं चिन्तयेत्‌ साध्यं मृत्युमाप्नोपि जीवित  ।।

ॐ जूं सः ह्रौं शिरं पातु देवो मृत्युंजयो मम ।
ॐ श्रीं शिवो ललाटं च ॐ ह्रौं भ्रु वो सदाशिव:  ।।

नीलकंठो वतान्नेत्रे कपर्दी मे वतच्छुती ।
त्रिलोचनो वताद् गण्डौ नासा मे त्रिपुरान्तकः  ।।

मुखं पीयूषघटमृदौष्ठौ मे कृत्तिकाम्बरः ।
हनुं मे हाटकेशनो मुखं बटुक-भैरव : ।।

कन्धरां कालमथनो गलं गण प्रियोऽवतु।
स्कन्दौ स्कन्दपिता पातु हस्तौ मे गिरिशोऽवतु  ।।

नखान्‌ मे गिरिजानाथः पायादंगलि संयुतान्‌ ।
स्तनौ तारापतिः पातु वक्षः पशुपतिर्मम  ।।
कुक्षि कुबेर-वरदः पार्श्वौ मे मारशासनः ।
सर्वः पातु तथा नाभिं शूली पृष्ठं ममावतु  ।।

शिश्नं मे शंकरः पातु गुह्यं गुह्यक-वल्लभः ।
कटिं कालान्तकः पायादूरुमेऽन्धकघातनः  ।।

जागरूकोऽवताज्जानू जंघे मे कालभैरवः ।
गुल्फो पायाज्जटाधारी पादौ मृत्युंजयोऽवतु  ।।

पादादिमूर्धपर्यन्तमघोरः पातु मां सदा ।
शिरसः पादपर्यन्तं सद्योजातो ममावतु  ।।

रक्षाहीनं नामहीनं वपुः पातु मृतेश्वरः ।
पूर्वे बलविकरणो दक्षिणे कालशासनः  ।।
पश्चिमे पार्वतीनाथो ह्युत्तरे मां मनोन्मनः ।
ऐशान्यामीश्वरः पायादाग्नेय्यामग्निलोचनः  ।।

नैऋत्याँ शम्भुरव्यान्मां वायव्याँ वायुवाहनः ।
उर्ध्वे बलप्रमथनः पाताले परमेश्वरः  ।।

दशदिक्षु सदा पातु महामृत्युंजयश्च माम्‌।
रणे राजकुले द्यूते विषमे प्राणसंशये  ।।

पाया दों जूं महारुद्रो देव-देवो दशाक्षरः।
प्रभाते पातु मां ब्रह्मा मध्याह्ने भैरवोऽवतु  ।।

सर्व तत्‌ प्रशमं याति मृत्युंजय-प्रसादतः ।
धनं पुत्रान्‌ सुखं लक्ष्मीमारोग्यं सर्वसम्पदः  ।।

प्राप्नोति साधकाः सद्यो देवि सत्यं न संशयः ।
इतीदं कवचं पुण्यं महामृत्युंजयस्य तु  ।।

गोप्यं सिद्धिप्रदं गुह्यं गोपनीयं स्वयोनिवत्‌ ।
। इति रुद्रयामले तन्त्रे देवीरहस्ये मृत्युंजयपंचांगे मृत्युंजयकवचं संपूर्णम्‌ ।


महामृत्युंजय कवच का पाठ करने से जपकर्ता की देह सुरक्षित होती है। जिस प्रकार सैनिक की रक्षा उसके द्वारा पहना गया कवच करता है उसी प्रकार साधक की रक्षा यह कवच करता है। इस कवच को लिखकर गले में धारण करने से शत्रु परास्त होता है। इसका प्रातः, दोपहर व सायं तीनों काल में जप करने से सभी सुख प्राप्त होते हैं। इसके धारण मात्र से किसी शत्रु द्वारा कराए गए तांत्रिक अभिचारों का अंत हो जाता है। धन के इच्छुक को धन, संतान के इच्छुक को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

Rudhra Abhishek - (रुधरा अभिषेक)

Rudhra Abhishek - (रुधरा अभिषेक)

01 - Shiva Manhima Strotram - Rameshbhai Oza.mp3



02 - Tasmay Nakaraye Namaha Shivaya - Rameshbhai Oza.mp3



03 - Bilwastakam - Rameshbhai Oza.mp3



04 - Shiv Manas Puja - Rameshbhai Oza.mp3



05 - Lingastakam - Rameshbhai Oza.mp3



06 - 12 Jyotrilinga - Rameshbhai Oza.mp3



07 - Shiv Aarti - Rameshbhai Oza.mp3



08 - Karpoora Gauram - Rameshbhai Oza.mp3



09 - Shiv Tandav Strotram - Rameshbhai Oza.mp3



10 - Shivastakam - Rameshbhai Oza.mp3



11 - Nataraj Namo Namaha - Rameshbhai Oza.mp3



12 - Rudrashtakam - Rameshbhai Oza.mp3



13 - Shivastavaha - Rameshbhai Oza.mp3



14 - Nirvan Satakam - Rameshbhai Oza.mp3



15 - Shivoham Shivoham - Rameshbhai Oza.mp3



16 - Samaphanam - Rameshbhai Oza.mp3



17 - Mahadev Shiv Sankar - Rameshbhai Oza.mp3



Purna Shiv Laghuruddari (पूर्ण शिव लघुरुद्द्री) - Shravan Maas Purna Puja

Purna Shiv Laghuruddari  (पूर्ण  शिव  लघुरुद्द्री)




Shiv Laghu-rudadri Part-1





Shiv Laghu-rudadri Part-2





Shiv Laghu-rudadri Part-3





Shiv Laghu-rudadri Part-4





Shiv Laghu-rudadri Part-5





Shiv Laghu-rudadri Part-6





श्रावण मास : किससे बने शिवलिंग की पूजा करें

किससे बने शिवलिंग की पूजा करने से क्या लाभ होगा

1. कानूनी समस्याओं के निवारण के लिए लहसुनिया पत्थर का शिवलिंग बनाकर पूजा करना लाभकारी होता है।

2. अनावश्यक विघ्, परेशानी, भय और भ्रम के निवारण के लिए दूर्वा को पीसकर उसको शिवलिंग का आकार देकर पूजन करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

3. संतान प्राप्ति के लिए बांस के अंकुर से शिवलिंग का निर्माण करें और पूजन करें।

4. कारोबार में वृद्धि, धन प्राप्ति, बचत आदि के लिए दही को कपड़े में बांधकर पानी निकालने के बाद जब दही कठोर होता है तो उससे शिवलिंग बनाकर पूजन करें। संपूर्ण धन संबंधी परेशानियों का निवारण होगा।

5. पारिवारिक सुख, वैवाहिक समस्याओं के निवारण, चीनी का शिवलिंग बनाकर पूजन करें।

6. आरोग्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए चंदन से बने शिवलिंग की पूजा करें।

7. जीवन की संपूर्ण सफलताओं के लिए चांदी, स्वर्ण, पारद, स्फटिक व नरदेश्वर शिवलिंग की पूजा करना अति कल्याणकारी माना गया है।

श्रावण मास : कैसे चढ़ाएं पुष्पों को

1. फूल, फल और पत्ते जैसे ही उगते वैसे ही अर्पित करने चाहिए। चढ़ाते समय इनका मुंह ऊपर की ओर होना चाहिए।

2. दूर्वा और तुलसी दल को अपनी ओर और बेलपत्र को नीचे मुख कर चढ़ाना चाहिए।

3. दाहिने हाथ की हथेली को सीधा करके मध्यमा, अनामिका और अंगूठे की सहायता से फूल और बेलपत्र चढ़ाना चाहिए।

4. भगवान शिव पर चढ़े हुए पुष्प और पत्तों को अंगूठे और तर्जनी अंगुली की सहायता से उतारना चाहिए।




श्रावण मास में शिव पूजा - Shiv Upasana

श्रावण मास में शिव पूजा - शिव उपासना 


श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र होने से मास का नाम श्रावण हुआ और वैसे तो प्रतिदिन ही भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। 

लेकिन श्रावण मास में भगवान शिव के कैलाश में आगमन के कारण व श्रावण मास भगवान शिव को प्रिय होने से की गई समस्त आराधना शीघ्र फलदाई होती है। इस वर्ष श्रावण मास 16 जुलाई से आरंभ हो रहा है।

जो भक्त पूरे महीने उपवास नहीं कर सकते वे श्रावण मास के सोमवार का व्रत कर सकते हैं। सोमवार के समान ही प्रदोष का महत्व है। इसलिए श्रावण में सोमवार व प्रदोष में भगवान शिव की विशेष आराधना की जाती है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार श्रावण में ही समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने पीकर सृष्टि की रक्षा की थी। इसलिए इस माह में शिव आराधना करने से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है।

अमोघ फलदाई सोमवार व्रत----

शास्त्रों और पुराणों में श्रावण सोमवार व्रत को अमोघ फलदाई कहा गया है। विवाहित महिलाओं को श्रावण सोमवार का व्रत करने से परिवार में खुशियां, समृद्घि और सम्मान प्राप्त होता है, जबकि पुरूषों को इस व्रत से कार्य-व्यवसाय में उन्नति, शैक्षणिक गतिविधियों में सफलता और आर्थिक रूप से मजबूती मिलती है। अविवाहित लड़कियां यदि श्रावण के प्रत्येक सोमवार को शिव परिवार का विधि-विधान से पूजन करती हैं तो उन्हें अच्छा घर और वर मिलता है।

शिव गायत्री मंत्र से होंगे दोष निवारण ---

जातक को यदि जन्म पत्रिका में कालसर्प, पितृदोष एवं राहु-केतु तथा शनि से पीड़ा है या ग्रहण योग है या फिर मानसिक रूप से विचलित रहते हैं, उन्हें भगवान शिव की गायत्री मंत्र से आराधना करना चाहिए। क्योंकि कालसर्प, पितृदोष के कारण राहु-केतु को पाप-पुण्य संचित करने और शनिदेव द्वारा दंड दिलाने की व्यवस्था भगवान शिव के आदेश पर ही होती है। इससे सीधा अर्थ निकलता है कि इन ग्रहों के कष्टों से पीडित व्यक्ति भगवान शिव की आराधना करे तो महादेवजी उस जातक की पीड़ा दूर कर सुख पहुंचाते हैं। भगवान शिव की शास्त्रों में कई प्रकार की आराधना वर्णित है लेकिन शिव गायत्री मंत्र का पाठ सरल एवं अत्यंत प्रभावशील है।

मंत्र निम्न है- ---

ॐ तत्पुरूषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र प्रचोदयात।

इस मंत्र को किसी भी सोमवार से प्रारंभ कर सकते हैं। इसी के साथ सोमवार का व्रत करें तो श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होंगे। शिवजी के सामने घी का दीपक लगाएं। जब भी यह मंत्र करें एकाग्रचित्त होकर करें, पितृदोष एवं कालसर्प दोष वाले व्यक्ति को यह मंत्र प्रतिदिन करना चाहिए। सामान्य व्यक्ति भी करे तो भविष्य में कष्ट नहीं आएगा। इस जाप से मानसिक शांति, यश, समृद्धि, कीर्ति प्राप्त होती है। शिव की कृपा का प्रसाद मिलता है।

भोलेनाथ को यूं रिझाएं-----

1 बिल्वपत्रं शिवार्पणम्-----
भगवान शिव को जो पत्र-पुष्प प्रिय हैं उनमें बिल्वपत्र प्रमुख है। श्रावण मास में बिल्वपत्र को शिव पर अर्पित करने से धन-संपदा, ऎश्वर्य प्राप्त होता है। लिंग पुराणानुसार "बिल्व पत्रे स्थिता लक्ष्मी देवी लक्षण संयुक्ता" अर्थात बिल्व पत्र में लक्ष्मी का वास माना जाता है। बिल्व वृक्ष को श्री वृक्ष भी माना जाता है। ऋग्वेदोक्त श्री सूक्त के अनुसार मां लक्ष्मी के तपोबल से बिल्वपत्र उत्पन्न हुआ, जो दरिद्रता को दूर करने वाला है। यह न केवल बाहरी बल्कि भीतरी दरिद्रता को भी दूर करने में समर्थ है। भगवान शिव की पूजा में पुष्पों का अभाव होने पर बिल्वपत्र चढ़ाने से भी शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वपत्र को हमेशा शिवलिंग पर उल्टा चढ़ाना चाहिए। श्रावण मास में सहस्त्र बिल्वपत्र शिवलिंग पर चढ़ाने से शीघ्र ही समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

2 रूद्राक्ष धारण करें-----

पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शंकर के नेत्रों से आंसू की बूंदे टपकी, जो पृथ्वी पर गिरकर रूद्राक्ष के रूप में परिवर्तित हो गई। शंकर (रूद्र) की आंखों (अश्रु) से उत्पन्न होने के कारण ही इस वृक्ष के फल को रूद्राक्ष कहा गया। रूद्राक्ष भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय हैं। इसीलिए मान्यता है कि रूद्राक्ष में स्वयं भगवान शंकर का निवास है। रूद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आयुर्वेद के अनुसार रूद्राक्ष कफ निवारक व वायुविकार नाशक भी है। रूद्राक्ष का उपयोग ग्रहों के कुप्रभावों को दूर करने के लिए भी किया जाता है। जिस प्रकार रत्न व उपरत्न से ग्रहों के दोष दूर होते हैं उसी प्रकार रूद्राक्षों से भी ग्रहों के दोषों का निवारण संभव होता है।

3 पारद शिवलिंग की करें आराधना---

पारे को विशेष प्रक्रियाओं द्वारा शोधित करके उसे ठोस बनाकर शिवलिंग बनाया जाता है। करोड़ों शिवलिंगों की पूजा से जो फल प्राप्त होता है उससे भी अधिक गुनाफल पारद शिवलिंग की पूजा करने से प्राप्त होता है। गरूड़ पुराण में पारद शिवलिंग को ऎश्वर्यदायक कहा है। इसकी पूजा करने से धन, असीम ज्ञान व ऎश्वर्य प्राप्त होता है। पौराणिक मान्यतानुसार रावण ने भी पारद शिवलिंग के निर्माण एवं उसकी पूजा उपासना कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। पारद शिवलिंग का निर्माण विशेष मुहूर्त में किया जाता है। श्रावण मास में पारद शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करके घर पर नित्य पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

4 कावड़ यात्रा पर जाएं----

श्रावण मास में भगवान शिव को रिझाने के लिए भक्त कावड़ यात्रा करते हैं। मान्यतानुसार पवित्र सरोवर या प्राचीन नदी के जल को लेकर पैदल चलकर शिव को रिझाने के लिए जल से अभिषेक एवं संपूर्ण श्रावण मास का व्रत करें। कावड़ लाकर भोले नाथ का जलाभिषेक करने की शुरूआत कब और कहां से हुई कुछ ठीक तरह से कहना मुश्किल है। पर यह जरूर है कि भगवान परशुराम पहले कावडिए थे, जिन्होंने गंगा जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया।

अरिष्ट नाश के लिए----

जन्म कुंडली में अष्टम भाव आयु का है। इससे भी अष्टम भाव तृतीय भाव भी आयु का स्थान है। इनसे बारहवें भाव, द्वितीय एवं सप्तम भाव दोनों मारक भाव हैं। इस भाव में स्थित ग्रह एवं भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। इन स्थानों में स्थित कू्रर ग्रह के कारण उत्पन्न होने वाले अरिष्ट आयु में कमी, रोग आदि प्रदान करते हैं। भगवान शिव स्वयं काल हैं, जिन्होंने काल पर विजय प्राप्त की है। मृत्यु को अपने अधीन किया। इसलिए उन्हे मृत्युंजय भी कहते हैं। जिन्हें अरिष्ट व मारकेश की दशा चल रहीं हो वे भगवान शिव की आराधना करें।

नव ग्रहों की शांति के लिए शिवाभिषेक----

सूर्य- भगवान शिव पर जल से अभिषेक
चंद्र- कच्चे दूध में काले तिल डालकर अभिषेक
मंगल- गिलोए की बूटी के रस से अभिषेक
बुध- विधारा की बूटी के रस से अभिषेक
बृहस्पति- कच्चे दूध में हल्दी मिलाकर अभिषेक
शुक्र- पंचामृत से अभिषेक
शनि- गन्ने के रस से अभिषेक
राहु-केतु- भांग से अभिषेक करें।
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भोले भंडारी का प्रिय श्रावण मास---

श्रावण मास 16 जुलाई से प्रारंभ हो गया है, जो 13 अगस्त तक रहेगा। भगवान शिव को यह मास अतिप्रिय है। श्रावण मास लगते ही जहां मन में सुकून और ठंडक का अहसास होता है, वहीं धरती पर हरियाली लहराने लगती है। प्रकृति को सजा-संवरा देख वन-उपवन में मयूर नाचने लगते हैं। मेघ मल्हार गाते हैं और श्रावण के स्वागत में हर दिल में सावन के गीत गूंज उठते हैं कि सावन को आने दो...

भगवान शिव की पूजा-अर्चना का पवित्र महीना श्रावण मास शुरू हो गया है। प्रथम श्रावण सोमवार, 18 जुलाई को मनाया जाएगा। शिवालयों में अलसुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगेगी तथा बम-बम भोले से मंदिर गुंजायमान होंगे।

माना जाता है कि शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की नगरी का भार है। उसमें श्रावण मास भी अपना विशेष महत्व रखता है। इसलिए श्रावण का महीना अधिक फल देने वाला होता है।

श्रावण माह में एक बिल्वपत्र शिव को चढ़ाने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। एक अखंड बिल्वपत्र अर्पण करने से कोटि बिल्वपत्र चढ़ाने का फल प्राप्त होता है।

इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामुट्ठी चढ़ाई जाती है। इससे सभी प्रकार के कष्‍ट दूर होते हैं तथा मनुष्य अपने बुरे कर्मों से मुक्ति पा सकता है।

प्रथम सोमवार को कच्चे चावल एक मुट्ठी।

दूसरे सोमवार को सफेद तिल्ली एक मुट्ठी।
तीसरे सोमवार को खड़े मूंग की एक मुट्ठी।
चौथे सोमवार को जौ एक मुट्ठी।
पांचवें सोमवार को सतुआ चढ़ाना चाहिए।
साथ ही भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए शिव को कच्चा दूध, सफेद फल, भस्म तथा भांग, धतूरा, श्वेत वस्त्र अधिक प्रिय है। श्रावण मास में शिवभक्तों द्वारा शिव पुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्त्रोत, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। श्रावण मास में इसके करने से अधिक फल प्राप्त होता है।

आषाढ़ में गरज-चमक के साथ बदरवा बरसते हैं तो सावन में सेरे आते हैं वहीं भादौ में लगती है बारिश की झड़ी, लेकिन व्रत-त्योहार की झड़ी श्रावण से लगेगी जो भादौ, क्वांर व कार्तिक मास तक चलेगी। माह के अन्य व्रत त्योहारों के अलावा हरियाली अमावस्या, नागपंचमी, रक्षाबंधन विशेष रूप से होंगे।
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शिव को प्रिय है रूद्राक्ष----
प्रकृति का अनमोल रत्न "रूद्राक्ष" भगवान शिव को बेहद प्रिय है। रूद्राक्ष को धारण करने से जहां मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास होता है वहीं स्वास्थ्य लाभ तथा भाग्योन्नति भी होती है।

एक मुखी रूद्राक्ष--- को शिव स्वरूप माना जाता है। यह अत्यंत दुर्लभ है। इसका संचालक सूर्य है। सूर्य की अनुकूलता के लिए इसे पहना जाता है। इसे किसी शुभ तिथि में सफेद धागे में पिरोकर "ॐ नम: शिवाय:" मंत्र से अभिमंत्रित कर, गले में पहनना चाहिए।

दो मुखी रूद्राक्ष--- अर्धनारीश्वर स्वरूप है। इसे लाल धागे में पिरोकर, सोमवार के दिन दाहिने हाथ में "ॐ अध्र्यनारीश्वर देवाय नम:" मंत्र का जप करते हुए बांधना चाहिए। इसको धारण करने से चंद्रमा की अनुकूलता से मानसिक शांति मिलती है।

तीन मुखी रूद्राक्ष--- का स्वामी अग्निदेवता हैं। मंगल की अनुकूलता के लिए इसे धारण करने से हीन भावना, आत्मग्लानि, भय और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। इसको लाल धागे में पिरोकर मंगलवार को "ॐ नमो नारायणाय नम:" मंत्र का जप करके पहनना चाहिए।

चार मुखी रूद्राक्ष--- का स्वामी ब्रह्मा तथा संचालक ग्रह बुध है। यह सृजनशील व्यक्तियों के लिए विशेष लाभकारी है। इसे लाल धागे में पिरोकर, बुधवार के दिन प्रात: "ॐ ब्रह्म देवाय नम:" मंत्र से अभिमंत्रित कर पहनना चाहिए।

पांच मुखी रूद्राक्ष--- शिव पुरूष रूद्र द्वारा नियंत्रित तथा बृहस्पति द्वारा संचालित है। इसके एक से तीन दाने तक लाल धागे में पिरोकर "ॐ नम: शिवाय:" मंत्र का जप करते हुए धारण करना चाहिए। यह रूद्राक्ष मानसिक तनाव से मुक्ति देता है।

छह मुखी रूद्राक्ष---- का स्वामी कार्तिकेय तथा संचालक ग्रह शुक्र है। यह रक्तचाप, दिमागी परेशानी, ह्वदयरोग आदि बीमारियों में लाभकारी है। इसके तीन दानों को लाल धागे में पिरोकर "ॐ नम: शिवाय कार्तिकेय नम:" मंत्र का जप करते हुए गले में पहनना चाहिए।

सात मुखी रूद्राक्ष--- महालक्ष्मी द्वारा नियंत्रित तथा शनि द्वारा संचालित होता है। आर्थिक, शारीरिक और मानसिक विपत्तियों से ग्रस्त लोगों द्वारा इसे धारण करना चाहिए। इसे लाल धागे में पिरोकर "ॐ श्रीं श्रीयै नम:" मंत्र का जप करते हुए गले या दाएं बाजू में पहनना चाहिए।

आठ मुखी रूद्राक्ष--- के स्वामी गणेश तथा संचालक ग्रह राहू है। इसके धारण करने से आपस में द्वेष रखने वालों का मन बदलता है और मित्रता बढ़ाता है। इसे लाल धागे में पिरोकर "ॐ गं गणपतये नम:" मंत्र का जप करते हुए धारण करें।

नौ मुखी रूद्राक्ष--- की मां दुर्गा स्वामिनी है। भैरव स्वरूप इस रूद्राक्ष का संचालक ग्रह केतु है। इसे लाल धागे में पिरोकर, सोमवार के दिन "ॐ दंु दुुर्गाय नम:" मंत्र का जप करते हुए गले में पहनना चाहिए। इसको पहनने से सहनशीलता, कर्मठता व साहस में वृद्धि होती है।

दस मुखी रूद्राक्ष--- के स्वामी दशावतारी विष्णु भगवान हैं। वास्तु दोष निवारक इस रूद्राक्ष की पूजा करने से गृह शांति होती है। इसे लाल धागे में पिरोकर रविवार को "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करते हुए गले या दाएं बाजू में धारण करना चाहिए।

ग्यारह मुखी रूद्राक्ष--- के अधिपति हनुमान जी हैं। यह निर्णय क्षमता बढ़ाता है। व्यापार और विदेश यात्रा में सहायक होता है। इसे एक दाने को लाल या पीले धागे में पिरोकर सोमवार को सूर्योदय से पूर्व इष्टदेव के मंत्र का जप करते हुए गले में पहनें।

बारह मुखी रूद्राक्ष---- भगवान सूर्य का प्रतिरूप है। इसके एक दाने को पीले धागे में पिरोकर सूर्योदय के समय "ॐ घृणि सूर्याय नम:" मंत्र के साथ गले में धारण करना चाहिए। इसे राजनीतिज्ञ, व्यापारी व यश चाहने वालों को पहनना चाहिए।

तेरह मुखी रूद्राक्ष---- कामदेव का प्रतिरूप है। इसे लाल या पीले धागे में पिरोकर "ॐ वज्रहस्ताय नम:" मंत्र का जप करते हुए गले में धारण करना चाहिए।

चौदह मुखी रूद्राक्ष--- का अधिपति श्री नीलकंठ है। अति दुर्लभ और परम प्रभावशाली यह रूद्राक्ष साक्षात देव मणि है। इसे लाल धागे में पिरोकर सोमवार के दिन शिवलिंग से स्पर्श करके "ॐ नम: शिवाय:" मंत्र का जप करते हुए शिव के समक्ष गले में धारण करें।

!! ॐ नमः शिवाय !! बोलो हर हर महादेव !!

Maha Shivaratri महाशिवरात्रि





Maha Shivaratri महाशिवरात्रि :

महाशिवरात्रि पूजाविधि

शिवपुराणके अनुसार व्रती पुरुषको महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्न्नान-संध्या आदि कर्मसे निवृत्त होनेपर मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गलेमें रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिपूर्वक पूजन एवं शिवको नमस्कार करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रतका इस प्रकार संकल्प करना चाहिये-

शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥


महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें।

महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण

 

सम्पूर्ण – महाशिवरात्रि पूजा विधि के दौरान ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ’समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करें। कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करें।

महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है और भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

Wednesday, January 11, 2012

Very Interesting !!

The world's highest chained carousel, located in Vienna, at a height of 117 meters.

 
 Thor's Well a/k/a "the gates of the dungeon" on Cape Perpetua, Oregon. At moderate tide and strong surf, flowing water creates a fantastic landscape

Emerald Lake in the crater of an extinct volcano. Tongariro National Park - NewZealand

 Restaurant on a cliff on the east coast of Zanzibar.
Depending on the tide the restaurant can be reached both on foot and by boat.

 Office of Selgas Cano in Madrid
 

Desert witPhacelia (Scorpion Weed). Flowering once in several years.


Balloons in Cappadocia.  
 Dubai. The view from the skyscraper BurjKhalifa. The height of buildings is 828 m (163 floors).


And this is the view down

 These trees grow in the forest near Gryfino, Poland. The cause of the curvature is unknown 
 The border between Belgium and the Netherlands in a cafe
 Twice a year in the Gulf of Mexico rays migrate. About 10 thousand stingrays swim from the Yucatan Peninsula to Florida in the spring and back in the fall.


In the resort town of Skagen you can watch an amazing natural phenomenon. This city is the northernmost point of Denmark, wherthe Baltic and North Seas meet. The two opposing tides in this place can not merge because they have different densities.
 In the Chinese province of Shandong is a bridge across the Gulf of Jiaozhou. The bridge length over 36 km is calculated for eight car lanes, and is the longest sea bridge in the world.

 Day and night. The monument in Kaunas, Lithuania
 An unusual tunnel in California's Sequoia National Park
 This statue, created by Bruno Catalano, is located in France



 The longest traffic jam in the world recorded in China. Its length is 260 kilometers
 Paris computer games store. In fact, the floor is absolutely flat.
 
  In the city of Buford (USA) lives just one person. He works as a janitor and as a mayor.
 

Autumn camouflage

 Haus Rizzi - Germany.

 Lena Pillars. Russia, the Lena River.
 Banpo Bridge in Seoul, South Korea
 Favelas of Brazil. The boundary between wealth and poverty.

 Lost paradise in the Indian Ocean. Isle of Lamu.
 
 Balcony of floor 103 in Chicago.


From the outside it looks like
 View of the sunset from inside the wave.
 
 This is a unique geological phenomenon known as Danxia landform. These phenomena can be observed in several places in China. This example is located in Zhangye, Province of Gansu. The color is the result of an accumulation for millions of years of red sandstone and other rocks.



 Airport in the Maldives is located on an artificial island in the middle of the Indian Ocean
 
 Lighthouse guard in Mare, France must be one of the most courageous people on the planet!
Not everyone will have a smoke in such weather, and in such a place!

 Photo of storm in Montana, USA, 2010

 Skyscraper-Crescent Crescent Moon Tower (Dubai)
 
 Heavy fog in Sydney, which enveloped the whole city
 
 The river above the river: Magdeburg Water Bridge, Germany.
 Morning Glory - kind of clouds observed in the Gulf of Carpentaria in northern Australia
 
 Gibraltar Airport is one of the most extraordinary airports around the world