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Saturday, October 26, 2024

दिवाली की पुजा एवं महालक्ष्मी की चमत्कारी साधना (Mahalaxmi Upasna, Diwali Puja)


दिवाली की पुजा एवं महालक्ष्मी की चमत्कारी साधना 
(Mahalaxmi Upasna) 




दीपावली के दिन शुभ मुहूर्त में घर या दुकान में की जाती है.
Diwali Laxmi Puja 2010 date is November 5th.  
लक्ष्मी पुजन प्रारंभ करने का समय इस दीपावली मे.(To perform Lakshmi Puja on दीपावली).
प्रदोष काल(Pradosh Kaal) और निशित काल(Nishit kaal) आचा समय है(are very auspicious timings). 
इस दिवाली 2010 मे प्रदोष काल(Pradosh kaal) Lakshmi Puja का समय 6.03 pm से 8.22 pm संध्याकाळ(evening) 5th November 2010 को है.  
निशित काल(Nishit kaal) Lakshmi Puja का समय 8.23 pm से 10.46 pm रात्रि(Night) 5th November 2010 को है.
महानिशिता काल(Mahanishita Kaal) Lakshmi Puja का समय – 11.29 pm on November 5th से 1.51 am November 6th 2010 तक का है.

पूजा की सामग्री :-
  1. अबीर, गुलाल, कुमकुम, चन्दन.
  2. आंबे के लकडे का पाट (Mango Tree Wooden Table) Or (अनिय कोई लकड़े का पाट चलेगा)
  3. आंबे के पते का हार(Door Haar),3 हार माला,250gm फुल, गजरा (वेणी), गुलाब (रोसे), कमल (Lotus), ध्रुवा.
  4. १ गिला नारियल (Coconut), १ सुखा नारियल (गोरा)
  5. रोली, मोली (नाडाछड़ी), चावल (अक्षत, Rice), चावल mix with kumkum.
  6. कपूर, गुंगल धुप साथ मे कुछ काले कॉलसे(Coal), अगरबती, 5 घी(ghee) व तेल(oil) के दीपक.
  7. 5 फल(5 types of fruits), मिठाई, पेडा या हलवा माता को निवेद चाडावा, या माता की पसंदी खीर.
  8. हल्दी(Turmeric Powder).
  9. बताशे, खांड के खिलोने.
  10. Panchamrit पंचाम्रत (Mixture of Milk, Curd, Honey, Sugar, Ghee)
  11. पंचपात्र (Copper Plate),  चमच(Copper Spoon), वाटि (Copper small Bowl). (अगर नहीं हो तो सादे बर्तन भी चलेंगे).
  12. थालियां (Plates / Trays of Stainless steel/plastic) for keeping the Pooja Material
  13. गंगाजल (पानी), अत्तर (Fragrance Perfume Bottle).
  14. संख (Conch).
  15. लाल बलाउस पीस और सफ़ेद कपडा, लाल चुन्दडी या साडी, माताजी के श्रींगार का पेकेट ले, गणेश के वस्त्र ले.
  16. लक्ष्मी व गणेशजी की प्रतिमा (मूर्ति या छवि ले)
  17. ताम्बे का कलश (कलश गंगाजल और पानी से भरा हुआ)
  18. दाब आसन के साथ उन आसन या लाल आसन, लाल या केसरी धोती(अगर स्त्री है तो सीर पर चुन्दडी रखे) 
  19. Gold and/or Silver coin embossed with picture of Goddess Lakshmi, new Currency notes (सोना या चांदी के सिक्के)
  20. Jeweleries - सोना व चांदी(Golden/silver articles) (if available)
  21. Cash Register/Accounts Books, Coins Bag, Pen, Ink Pot (Black, Blue or Red)
  22. जानवे जोड़(Pair of Holy thread)
  23. मिटी के छोटे/बड़े दिया, कापूस(cotton wicks/रुइ), Mustard oil(सरसों के तैल), माचिस(Match Box).




माता लक्ष्मी का प्रिय निवेद के लिये सामग्री (खीर) :-
सामग्री :- 
1 Tea Spoon मध(Honey), 
500gm ढूध(Milk), 
1 Tea Spoon हल्दी(Turmeric Powder), 

250gm चावल(Rice), 
1 केला(Banana), 
50gm पंचमेवा(Dry Fruits), 
केसर(डालना है तो आप सजावट के लिए ड़ाल सकते हो)

नोट :- ये निवेद खास करके दीपावली मे लक्ष्मी पुजन के दिन माता लक्ष्मी के सामने धराते है. वहा ये माताजी की प्रिय निवेद है. गणेशजी को लाडू या मिठाई चडावे.



Vidhi (विधि) / Method of performing पूजा.
विधि :- पूर्व या उत्तर मुख करके पुजा प्रारंभ करे, पूजा प्रारंभ करने से पेले ना धोकर सुद्धा हो जाये, फिर धोती पहन ले, अगर स्त्री है तो अपने माथे (head) पर लाल चुन्दडी रखे, अब अम्बा का पाट लो (कोई भी लकड़े का पाट चलेगा अगर अम्बा का पाट नहीं है तो), उस पर लाल कपडा या बलाउस पीस बिछाओ, लक्ष्मी और गणेशजी की मूर्ति या छवि रखो, लक्ष्मी और गणेशजी को वस्त्र चडावे, हार, फुल, वेणी (गजरा), संगार चडावे. अपना आसन बिछाये पहले दाब का और उसके उप्पर लाल उन का आसन (लाल आसन या अनिय कोई भी आसन चलेगा), आसन पर बेठे. अपने सामने सभी सामग्री रखे, पंचपात्र और गंगाजल, चावल, हल्दी, चांदी का सिका(Coin),५ आसुपाला के पते, श्रीफल, ताम्बे के कलश मे रखे और लक्ष्मी और गणेशजी का ध्यान करते हुए पूजा की विधि प्रारंभ घी और तेल के दीपक को प्रज्वलित करके करे.

नोट:- गूगल का धुप सुबह, संध्या वहा रात्रि को आवसीय करे. अगर ये तीनी समय ना कर सके तो संध्या को अवशिया करे.
 
।। पवित्र करन ।।

पूर्वाभिमुख होकर बेठे, सब से पेले हम "पवित्र करन" इत्यादि मन्त्र से खुद को पवित्र करेंगे. बाया(Left) हाथ में जल ले और दाया(Right) हाथ से इस मंत्र को पड़ते पड़ते अपने सिर तथा शरीर पर छिड़क लें(Sprinkle the water on us).


ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।



।। आचमनम ।।
वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से साथ बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए । 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । 
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा । 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥


।। शिखावन्दनम ।। 
शिखा स्पर्श एवं वंदन - शिखा(Head) के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि देवी के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।  
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते । 
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥


।।  प्राणायाम: ।। 
श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है । श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ ।

 
।। न्यास: ।।
न्यास - इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जागृत करना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ (Left) हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने (Right) हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर  निचे बताए गए स्थान पर मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान् के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।

।। देवी महालक्ष्मी आव्हान ।।  
भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ लक्ष्मी की शक्ति वहाँ अवतरित हो व स्थापित हो रही है ।
Take flowers or unbroken grains of rice in your hands. Meditate upon the goddess, saying:



या सा पदमा सनसथा विपुला काती ताती पदमा पत्रायत अक्सी
गम भीरा वर्तना भिस्ताना भरना मिटा सुभरा वस्त्रोत्तारिया
या लक्ष्मीर दिव्या रूपा इर्मानी गाना खा सितैह सना पिताहेमा कुम्भ एह 

सा नित्यं पदमा हस्त मामा वास्तु ग्रहे सर्वा मंगल्यायुकता स्वः 

YA SA PADMA SANASTHA VIPULA KATI TATI PADMA PATRAYAT AKSI
GAM BHIRA VARTANA BHISTANA BHARANA MITA SUBHRA VASTROTTARIYA
YA LAKSMIR DIVYA RUPA IRMANI GANA KHA CITAIH SNA PITAHEMA KUMBH AIHSA NITYAM PADMA HASTA MAMA VASATU GRHE SARVA MANGALYAYUKTA SWAHA


Translation - Laksmi who is seated on a lotus, has eyes as wideas lotus petals, massive hips, deep navel, and wears white upperand lower garments, wears jewelry, is bathed from a golden pitcher, carries a lotus in her hand, and is associated with every auspicious sign, let her residein my house.
Drop the flowers and the rice at the feet of the goddess.


।। गणेश ध्यान ।।
भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप श्री महा गणेशजी की शक्ति वहाँ अवतरित व  स्थापित हो रही है ।
Take flowers or unbroken grains of rice in yourhands. Meditate upon the goddess, saying:

विनायकं हेमावर्षम पशांकुशाधाराम विभुं ध्ययोर गजाननं देवं बाला चन्द्र समप्रभाम
ॐ सहस्र-शीर्षा पुरुषः, सहसराक्शः सहसरपाथ, सह भूमिम विश्वठो वृत्वा त्याथिष्ट-द्धाशान्गुलम
श्री विनायकाय नमः ध्यानात ध्यानं समर्पयामि.

 
Ganesh who is seated on a Rose and is associated with every auspicious sign, let him residein my house.
Drop the flowers and the rice at the feet of the god.

 
।। गुरु ध्यान ।। 
गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें ।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः । गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

माँ अम्बा व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें । 
 ये पाच वास्तुये देवी माँ के समक्ष रखे 

जल का अर्थ है - नम्रता-सहृदयता ।
अक्षत का अर्थ है - समयदान अंशदान । 
पुष्प का अर्थ है - प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास । 
धूप-दीप का अर्थ है - सुगंध व प्रकाश का वितरण, 
पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है - स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश ।
ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं । कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है ।



।। दीपमालिका पूजन ।।
किसी पात्रमें 5, 7, 11, 21 या उससे अधिक दीपों को प्रज्वलित कर महालक्ष्मी MahaLakshmi के समीप रखकर उस दीप-ज्योतिका “ओम दीपावल्यै नमः” इस नाम मंत्रसे गन्धादि उपचारोंद्वारा पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करे-

त्वं ज्योतिस्तवं रविश्चन्दरो विधुदग्निश्च तारकाः |
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर्दीपावल्यै नमो नमः ||

Deepamaalika दीपमालिकाओं का पूजन कर अपने आचार के अनुसार संतरा, ईख, पानीफल, धानका लावा इत्यादि पदार्थ चढाये। धानका लावा (खील) गणेश Ganesha, महालछ्मी MahaLaxmi तथा अन्य सभी देवी देवताओं को भी अर्पित करे। अन्तमें अन्य सभी दीपकों को प्रज्वलित कर सम्पूर्ण गृह अलन्कृइत करे।


।। संकल्प ।।
दाहिने(Right) हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें.
ॐ  विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विन्ष्णुराज्ञ्या प्रवर्तमानश्य. हे देवी जगदम्बा मे भारत के ____________ राज्य(Name of your State) के __________ वासरे(  Name of your city) ______________ गामे(Name of your town) रहता / रहती हु, आज ___________ मासे(Name of all मासे मतलब [त्री, कुर्तिका, भाद्रपद]), के ____________ पक्षे (कृष्ण / शुक्ल) ______________ तिथि (एकं, बिज, एकादशी etc..) ____________ वार (सोमवार, सनिवार etc..) को मे ____________ नामा अहम् (Name of your) ___________ गोत्रौत्पन (Your Gotra Name eg. Kashyab, Haritatsat or Gautam), मे यह संकल्प करता / करती हु __________________________ (आप अपनी इछाये देवी के समक्ष कहो)(Tell your wishes, the purpose for which you are taking this sankalp) लेता / लेती हु. और फिर हाथ मे लिया हुआ जल और फुल महालक्ष्मी और गणेशजी के समक्ष अर्पण करो. इस तरह से आपका संकल्प पूरा हुआ. 

या फिर ये संकल्प भी कर सकते है
।। रदय संकल्प ।।
मैं (अपना नाम बोलें), सुपुत्र श्री (पिता का नाम बोलें), जाति (अपनी जाति बोलें), गोत्र (गोत्र बोलें), पता (अपना पूरा पता बोलें) अपने परिजनो के साथ जीवन को समृध्दि से परिपूर्ण करने वाली माता महालक्ष्मी (MahaLakshmi) की कृपा प्राप्त करने के लिये आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन महालक्ष्मी पूजन कर रहा/रही हूं। हे मां, कृपया मुझे धन, समृध्दि और ऐश्वर्य देने की कृपा करें। मेरे इस पूजन में स्थान देवता, नगर देवता, इष्ट देवता कुल देवता और गुरु देवता सहायक हों तथा मुझें सफलता प्रदान करें।
यह संकल्प पढकर हाथ में लिया हुआ जल, पुष्प और अक्षत आदि श्री गणेश-लछ्मी (Shree Ganesha-Laxmi) के समीप छोड दें।

।। आगे की विधि ।।
संकल्प लेने के बाद देवी का ध्यान करे और इसके बाद एक एक करके गणेशजी (Ganesha), मां लछ्मी (Mata Laxmi), मां सरस्वती (Accounts Books/Register/Baheekhaata), मां काली (Ink Pot Poojan ), धनाधिश कुबेर Lord Kuber(Tijori/Galla), तुला मान की पूजा करें। यथाशक्ती भेंट, नैवैद्य, मुद्रा, वस्तर  आदि अर्पित करें। फिर आपको जो कोई देवी का पाठ(जेसे की लक्ष्मी कवच, लक्ष्मी चालीसा, श्री शुक्तं, श्री लक्ष्मी शुक्तं इत्यादि...) या फिर जाप रुपे कोई भी देवी का मंत्र( श्री महालछ्मयै च विदमहे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लछ्मी प्रचोदयात् ॐ) कर सकते है. हर एक पाठ या एक जाप माला समाप्त होने के बाद समष्क रखे हुए कलश मे फुक मारे और अत्तर(perfume bottel) की एक एक बुंद लक्ष्मी गणेश और कलश पर लगावे. जब आपके पाठ या जाप 11 बार पूर्ण होजाए उसके पश्चात वह पानी से भरा हुआ कलश घर मे रखे हुए पानी के मटके मे ड़ाल दो, और सभी घर के सदसिय उस पानी को पिए, अगर आपको उस जल से अपने घर को भी पवित्र और देवी से रक्षा कवच घर मे करना चाहते है तो अंत मे थोडा जल बचाकर रखे और घर के सभी कोने, दीवारों और दुवार के उमरा पर वो अभिमंत्रित किया हुआ जल छिडके.(Sprinkle the water every where in your home walls and Door's).उसके बाद कलश मे से निकला हुआ सिका और हल्दी का घटिया लेकर घर या दुकान की तिजोरी मे रखे, उसके बाद माता लक्ष्मी और गणेशजी की आरती करे और अंत मे गुंगल धुप करे और पुरे घर या दुकान के सभी सदसियो को वो धुप दे.
नोट:-ये उपासना दीपावली के पाच दिन तक आप कर सकते है अगर आपको चमत्कारी फल प्राप्त करना हो तो. 

।। जप या पाठ करते वक्त क्या ध्यानमे रखे ।।
पाठ या जाप करते समय होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । पाठ या जाप की प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।
 
अगर आप पाठ या जाप मे से कोई बी एक क्रिया कर रहे हो, तो वह आपको हर रोज 11 बार पाठ पड़ना(Reading) या जाप की 11  मालाए करनी होंगी.



।। आरती और पुष्पांजलि ।।

गणेश, लक्ष्मी और भगवान जगदीश्वर की आरती Aarati करें। उसके बाद पुष्पान्जलि अर्पित करें, शमा Kshamaa प्रार्थना करें।


।। संकल्प छोड़ने की विधि - विसर्जन ।।
संकल्प छोड़ने के लिए दाया हाथ (Right Hand) मे चावल ले. फिर गणेश एवं महालक्ष्मी प्रतिमाको छोडकर अन्य सभी आवाहित, प्रतिष्ठित एवं पूजित देवताओं को अक्षत छोडते हुए निम्न मंत्रसे विसर्जित करे- 
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजमादाया मामकीम् |
इष्टकामसमृध्दयर्थं पुनरागमनाया च ||


छोटा मंत्र:- गछ गछ या देवी/देव तू गच्यान्ति..

अपने भावना अनुसार देवी महालक्ष्मी और गणेशजी की मूर्ति के समक्ष क्षमा याचना करे की अगर मेरे से कोई भूल या कोई टूटी रहगयी हो तो मुझे नादान , नासमाज बालक मानकर क्षमा करे और मेरे परिवार पर सदेव आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे.
नोट:-अगर आपको को देवी के मूर्ति मे से प्राण को वापसी नहीं भेजना हो तो देवी की मूर्ति या छवि को लेकर मंदिर मे रखे और फिर अक्षत(Rice) को पाठ पर छोड़ दे.

।। ध्यान केसे करे ।।
मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में देवी माँ के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में देवी का स्मरण करने से उनके के  स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

(उपासक)
लिखित,
कलपेश दावे.

Monday, February 20, 2012

Shivratri - શિવરાત્રિ વ્રતં

.. શિવરાત્રિ વ્રતં ..

Perform Ganapati puja praying for no hurdles to the puja. Do the sankalpam as prescribed below:


મમોપાત્ત સમસ્ત દુરિત ક્શયદ્વાર શ્રી પરમેશ્વર પ્રીત્યર્ત્તમ
શુભે શોભને મુહૂર્તે આદ્યબ્રહ્મણઃ દ્વિતીયપરાર્ધે
શ્વેત વરાહકલ્પે વૈવસ્વત મન્વંતરે કલિયુગે
પ્રથમપાદે જંબૂ દ્વીપે ભારતવર્ષે ભરતખણ્ડે
અસ્મિન વર્તમાને વ્યવહારિક - નામેન સંવત્સરે
ઉત્તરાયને શિશિર ઋતૌ કુમ્બ માસે
કૃષ્ણ પશે ચતુર્ધશ્યામ સુભતિતૌ - વાસર યુક્તાયામ
શુભનશત્ર શુભયોગ શુભકરણ એવંગુણ વિશેષણ વિશિષ્ટાયાં
શુભતિથૌ શિવરાત્રિ પુણ્યકાલે શ્રી પરમેશ્વર પ્રીત્યર્થં 
મમ શેમસ્થૈર્ય
વિજયાયુરારોગ્યૈશ્વર્યાપિ વૃદ્ધ્યર્થં ધર્માર્થ
કામમોશ ચતુર્વિધ ફલપુરુષાર્થ સિદ્ધ્યર્થં
ઇષ્ટ કામ્યાર્થ સિદ્ધ્યર્થં મમ સમસ્ત દુરિતોપ
શાન્ત્યર્થં સમસ્ત મઙ્ગળ વાપ્ત્યર્થં શ્રી સામ્બ સદાશિવ
પ્રસાદેન સકુટુમ્બસ્ય ઘ્ય઼્આન વૈરાગ્ય મોક્શ પ્રાપ્ત્યર્ત્તમ
વર્ષે વર્ષે પ્રયુક્ત શિવરાત્રિ પુણ્યકાલે સમ્બ પરમેશ્વ પૂજામ કરિષ્યે ||

નમઃ |
  • Now do the kalasa puja.
  • Meditate on Lord sambu parameshvara with this shloka:

ચન્દ્ર કોઠિ પ્રતીકાશં ત્રિનેત્રં ચન્દ્ર ભૂષણમ.હ |
આપિઙ્ગળ જટજૂટં રત્ન મૌળિ વિરાજિતમ.હ ||

નીલગ્રીવં ઉતારાઙ્ગં તારહારોપ શોભિતમ.હ |
વરદાભય હસ્તઞ્ચ હરિણઞ્ચ પરશ્વતમ.હ ||

તતાનં નાગ વલયં કેયૂરાઙ્ગત મુદ્રકમ.હ |
વ્યાઘ્ર ચર્મ પરીતાનં રત્ન સિંહાસન સ્થિતમ.હ ||

આગચ્ચ દેવદેવેશ મર્ત્યલોક હિતેચ્ચયા |
પૂજયામિ વિદાનેન પ્રસન્નઃ સુમુખો ભવ ||

ઉમા મહેશ્વરં દ્યાયામિ | આવાહયામિ ||
  • Do the prana pratishta of Lord Shiva and perform a simple puja with dhupa-dipam and fruit offering

પાદાસનં કુરુ પ્રાઘ્ય઼્અ નિર્મલં સ્વર્ણ નિર્મિતમ.હ |
ભૂષિતં વિવિતૈઃ રત્નૈઃ કુરુ ત્વં પાદુકાસનમ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | રત્નાસનં સમર્પયામિ ||

ગઙ્ગાદિ સર્વ તીર્થેભ્યઃ મયા પ્રાર્ત્તનયાહૃતમ.હ |
તોયમ એતત સુકસ્પર્શમ પાદ્યાર્થમ પ્રદિગૃહ્યતામ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | પાદ્યં સમર્પયામિ ||

ગન્ધોદકેન પુષ્પેણ ચન્દનેન સુગન્ધિના |
અર્ઘ્યં કૃહાણ દેવેશ ભક્તિં મે હ્યચલાં કુરુ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | અર્ઘ્યં સમર્પયામિ ||

કર્પૂરોશીર સુરભિ શીતળં વિમલં જલમ.હ |
ગઙ્ગાયાસ્તુ સમાનીતં ગૃહાણાચમણીયકમ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | આચમનીયં સમર્પયામિ ||

રસોસિ રસ્ય વર્ગેષુ સુક રૂપોસિ શઙ્કર |
મધુપર્કં જગન્નાથ દાસ્યે તુભ્યં મહેશ્વર ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | મધુપર્કં સમર્પયામિ ||

પયોદધિ કૃતઞ્ચૈવ મધુશર્કરયા સમમ.હ |
પઞ્ચામૃતેન સ્નપનં કારયે ત્વાં જગત્પતે ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | પઞ્ચામૃત સ્નાનં સમર્પયામિ ||

મન્ધાકિનિયાઃ સમાનીતં હેમાંબોરુહ વાસિતમ.હ |
સ્નાનાય તે મયા ભક્ત્યા નીરં સ્વીકૃયતાં વિભો ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | શુદ્દોદક સ્નાનમ સમર્પયામિ | 
સ્નાનાનન્તરં આચમનીયં સમર્પયામિ ||

વસ્ત્રં સૂક્શ્મં તુકૂલેચ દેવાનામપિ દુર્લભમ.હ |
ગૃહાણ ત્વમ ઉમાકાન્ત પ્રસન્નો ભવ સર્વતા ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | વસ્ત્રં સમર્પયામિ ||

યઘ્ય઼્ઓપવીતં સહજં બ્રહ્મણા નિર્મિતં પુરા |
આયુષ્યં ભવ વર્ચસ્યં ઉપવીતં ગૃહાણ ભો ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | યઘ્ય઼્ઓપવીતં સમર્પયામિ ||

શ્રીકણ્ઠં ચન્દનં દિવ્યં ગન્ધાઢ્યં સુમનોહરમ.હ |
વિલેપનં સુરશ્રેષ્ટ મત્દત્તમ પ્રતિ ગૃહ્યતામ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ગન્ધં સમર્પયામિ ||

અક્શદાન ચન્દ્ર વર્ણાપાન શાલેયાન સદિલાન શુભાન |
અલઞ્કારાર્થમાનીદાન ધારયસ્ય મહાપ્રભો ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | અક્શદાન સમર્પયામિ ||

માલ્યાતીનિ સુગન્ધીનિ મલદ્યાતીનિ વૈ પ્રભો |
મયાહૃદાનિ પુષ્પાણિ પૂજાર્થં તવ શઞ્કર ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | પુષ્પમાલાં સમર્પયામિ ||

|| અઙ્ગ પૂજ ||

શિવાય નમઃ | પાદૌ પૂજયામિ |
શર્વાય નમઃ |  કુલ્પૌ પૂજયામિ |
રુદ્રાય નમઃ | જાનુની પૂજયામિ |
ઈશાનાય નમઃ |  જઙ્ઘે પૂજયામિ |
પરમાત્મને નમઃ |  ઊરૂ પૂજયામિ |
હરાય નમઃ |  જઘનં પૂજયામિ |
ઈશ્વરાય નમઃ | ગુહ્યં પૂજયામિ |
સ્વર્ણ રેતસે નમઃ |  કટિં પૂજયામિ |
મહેશ્વરાય નમઃ | નાભિં પૂજયામિ |
પરમેશ્વરાય નમઃ | ઉદરં પૂજયામિ |
સ્ફટિકાભરણાય નમઃ |  વક્શસ્થલં પૂજયામિ |
ત્રિપુરહન્ત્રે નમઃ |  ભાહૂન પૂજયામિ |
સર્વાસ્ત્ર ધારિણે નમઃ |  હસ્તાન પૂજયામિ |
નીલકણ્ઠાય નમઃ | કણ્ઠં પૂજયામિ |
વાચસ્પતયે નમઃ | મુખં પૂજયામિ |
ત્ર્યમ્બકાય નમઃ | નેત્રાણિ પૂજયામિ |
ફાલ ચન્દ્રાય નમઃ |  લલાટં પૂજયામિ |
ગઙ્ગાધરાય નમઃ |  જટામણ્ડલં પૂજયામિ |
સદાશિવાય નમઃ |  શિરઃ પૂજયામિ |
સર્વેશ્વરાય નમઃ | સર્વાણ્યઙ્ગાનિ પૂજયામિ |
  • PerforM the shivashtottara sata or sahasra namavali puja.
  • Refer to (1) (2) below.

સામ્બ પરમેશ્વરાય નમઃ | નાનાવિત પરિમળપત્ર
 પુષ્પાણિ સમર્પયામિ ||

|| ઉત્તરાઙ્ગ પૂજ ||

વનસ્પતિરસોદ્ભૂતઃ ગન્ધાઢ્યશ્ચ મનોહરઃ |
આગ્રેયઃ સર્વદેવાનાં ધૂપોયં પ્રતિગૃહ્યતામ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ધૂપં આગ્રાપયામિ ||

સાજ્યં ત્રિવર્ત્તિ સમ્યુક્તં વહ્નિના યોજિતં મયા |
દીપં ગૃહાણ દેવેશ ત્રૈલોક્ય તિમિરાપહમ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | દીપં દર્શયામિ ||

નૈવેદ્યં ગૃહ્યતાં દેવ ભક્તિં મે હ્યચલાં કુરુ |
શિવેપ્સિતં વરં દેહિ પરત્ર ચ પરાં ગતિમ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | મહાનૈવેદ્યં સમર્પયામિ ||

ૐ ભૂર્ભુવસ્સુવઃ તત્સવિતુર્વરેણ્યં ભર્ગો દેવસ્ય 
ધીમહિ દિયો યો નઃ પ્રચોદયાત.હ |
ૐ દેવ સવિતઃ પ્રસૂવ સત્યં ત્વર્થેન પરિશિઞ્ચામિ |
 અમૃતોપસ્તરણમસિ | 
ૐ પ્રાણયસ્વાહા | ૐ અપાનાયસ્વાહા | ૐ વ્યાનાય સ્વાહા |
 ૐ ઉદાનાય સ્વાહા | ૐ સમાનાય સ્વાહા |
ૐ બ્રહ્મણે સ્વાહા | બ્રહ્મણિ મ આત્મા અમૃતત્વાય | 
અમૃતાભિતાનમસિ ||

નૈવેદ્યાનન્તરં આચમનીયં સમર્પયામિ |

પૂગીફલ સમાયુક્તં નાગવલ્લી દળૈર યુતમ.હ |
કર્પૂર ચૂર્ણ સંયુક્તં તાંબૂલં પ્રતિગૃહ્યતામ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | કર્પૂર તાંબૂલં સમર્પયામિ ||

ચક્શુર્તં સર્વલોકાનાં તિમિરસ્ય નિવારણમ.હ |
આર્દિગ્યં કલ્પિતં ભક્ત્યા ગૃહાણ પરમેશ્વર ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | કર્પૂર નીરાઞ્જનં સમર્પયામિ | 
આચમનીયં સમર્પયામિ ||

યાનિકાનિચ પાપાનિ જન્માન્તર કૃતાનિ ચ |
તાનિ તાનિ વિનશ્યન્તિ પ્રદક્શિણ પતે પતે ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | પ્રદક્શિણં સમર્પયામિ ||

પુષ્પાઞ્જલિં પ્રદાસ્યામિ ગૃહાણ કરુણાનિદે |
નીલકણ્ઠ વિરૂપાક્શ વામાર્દ ગિરિજ પ્રભો ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | પુષ્પાઞ્જલિં સમર્પયામિ | 
મન્ત્રપુષ્પં સ્વર્ણપુષ્પં સમર્પયામિ ||

મન્ત્રહીનં ક્રિયાહીનં ભક્તિહીનં સુરેશ્વર |
યત્પૂજિતં મયા દેવ પરિપૂર્ણમ તતસ્તુ તે ||

વન્દે શમ્ભુમુમાપતિં સુરગુરું વન્દે જગત્કારણમ.હ 
  વન્દે પન્નગભૂષણં મૃગધરં વન્દે પશૂણામ પતિમ.હ |
વન્દે સૂર્ય શશાંકવહ્નિ નયનં વન્દે મુકુન્દ પ્રિયમ.હ 
  વન્દે ભક્ત જનાશ્રયઞ્ચ વરદં વન્દે શિવં શઙ્કરમ.હ ||

નમઃશિવાભ્યાં નવ યૌવનાભ્યાં 
  પરસ્પરાશ્લિષ્ટ વપુર ધરાભ્યામ.હ |
નગેન્દ્ર કન્યા વૃષ કેતનાભ્યાં
  નમો નમઃશઙ્કર પાર્વતીભ્યામ.હ ||

|| અર્ઘ્યમ ||

શુક્લામ્બરધરં વિશઃણું શશિવર્ણં ચતુર્ભુજં |
પ્રસન્ન વદનં દ્યાયેત સર્વવિગ્નોપશાન્તયે ||

મમોપાત્ત સમસ્ત દુરિત ક્શયદ્વાર શ્રી પરમેશ્વર
 પ્રીત્યર્ત્તં |
મયા ચરિત શિવરાત્રિ વ્રદપૂજાન્તે ક્શીરાર્ઘ્ય પ્રદાનં 
ઉપાયદાનઞ્ચ કરિષ્યે ||

નમો વિશ્વસ્વરૂપાય વિશ્વસૃષ્ટ્યાદિ કારક |
ગઙ્ગાધર નમસ્તુભ્યં ગૃહાણાર્ઘ્યં મયાર્પિતમ.હ ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

નમઃશિવાય શાન્તાય સર્વપાપહરાયચ |
શિવરાત્રૌ મયા દત્તમ ગૃહાણાર્ઘ્યં પ્રસીત મે ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

દુઃખ દારિદ્ર્ય પાપૈશ્ચ દગ્તોહં પાર્વતીપતે |
માં ત્વં પાહિ ,અહાભાહો ગૃહણાર્ઘ્યં નમોસ્તુ તે ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

શિવાય શિવરૂપાય ભક્તાનાં શિવદાયક |
ઇદમર્ઘ્યં પ્રદાસ્યામિ પ્રસન્નો ભવ સર્વતા ||

ઉમા મહેશ્વરાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

અંબિકાયૈ નમસ્તુભ્યં નમસ્તે દેવિ પાર્વતિ |
અમ્બિકે વરદે દેવિ ગૃહ્ણીદાર્ઘ્યં પ્રસીદ મે ||

પાર્વત્યૈ નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

સુબ્રઃમણ્ય મહાભગ કાર્તિકેય સુરેશ્વર |
ઇદમર્ઘ્યં પ્રદાસ્યામિ સુપ્રીતો વરદો ભવ ||

સુબ્રહ્મણ્યાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

ચણ્ડિકેશાય નમઃ | ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ઇદમર્ઘ્યં ||

અનેન અર્ઘ્ય પ્રદાનેન ભગવાન સર્વદેવાત્મકઃ સપરિવાર 
સંબ પરમેશ્વરઃ પ્રીયતામ.હ ||

|| ઉપાયન દાનમ ||

સાંબશિવ સ્વરૂપસ્ય બ્રાહ્મણસ્ય ઇતમાસનં | અમીતે ગન્ધાઃ ||
(Give tambulam, dakshina etc with the following mantra)

હિરણ્યગર્ભ ગર્ભસ્તં હેમબીજં વિભાવસોઃ |
અનન્તપુણ્ય ફલતં અતઃ શાન્તિં પ્રયચ્ચ મે ||

ઇદમુપાયનં સદક્શિણાકં સતાંબૂલં સાંબશિવપ્રીતિં કામમાનઃ 
તુભ્યમહં સમ્પ્રતતે ન મમ ||
Perform Salutation

ૐ સમસ્ત લોક સુખિનો ભવન્તુ ||

 | ૐ તત્સત બ્રહ્માર્પણમસ્તુ |
 
By: Kalpesh Dave. 

Maha Shivaratri महाशिवरात्रि





Maha Shivaratri महाशिवरात्रि :

महाशिवरात्रि पूजाविधि

शिवपुराणके अनुसार व्रती पुरुषको महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्न्नान-संध्या आदि कर्मसे निवृत्त होनेपर मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गलेमें रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिपूर्वक पूजन एवं शिवको नमस्कार करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रतका इस प्रकार संकल्प करना चाहिये-

शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥


महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें।

महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण

 

सम्पूर्ण – महाशिवरात्रि पूजा विधि के दौरान ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ’समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करें। कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करें।

महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है और भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

Monday, October 24, 2011

धन त्रयोदशी - धनतेरस - Dhanteras

धन त्रयोदशी

धन त्रयोदशी – इस दिन धन के देवता कुबेर और मृत्यु देवता यमराज की पूजा का विशेष महत्व है । इसी दिन देवताओं के वैद्य धनवंतरि ऋषि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे । अतः इस दिन धनवंतरी जयंती मनायी जाती है । निरोग रहते हेतु उनका पूजन किया जाता है । इस दिन अपने सामथ्र्य अनुसार किसी भी रुप मे चादी एवं अन्य धातु खरीदना अति शुभ है । धन संपति की प्राप्ति हेतु कुबेर देवता के लिए घर के पूजा स्थल पर दीप दान करें एवं मृत्यु देवता यमराज ( जो अकाल मृत्यु से करता है ) के लिए मुख्य द्वार पर भी दीप दान करें । 

कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। आज के दिन घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर रखा जाता है। आज के दिन नये बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन यमराज और भगवान धनवन्तरि की पूजा का महत्व है।

रुप चौदस , नरक चतुर्दशी एवं हनुमान जयंतीः इसे छोटी दीपावली भी कहते है । इस दिन रुप और सौदर्य प्रदान करने वाले देवता श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जाती है । इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और राक्षस बारासुर द्वारा बंदी बनायी गयी सोलह हजार एक सौ कन्याओं को मुक्ति दिलायी थी । अतः नरक चतुर्दशी मनायी जाती है । दूसरो अर्थात गंदगी है उसका अंत जरुरी है । इस दिन अपने घर की सफाई अवश्य करें । रुप और सौंदर्य प्राप्ति हेतु इस दिन शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करें । अंजली पुत्र बजरंगबलि हनुमान का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में हुआ था अतः हनुमान जयंती भी इसी दिन मनायी जाती है । सांय काल उनका पूजन एवं सुंदर कांड का पाठ अवश्य करें ।

धनतेरस - Dhanteras

धनतेरस - Dhanteras

जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।

 

जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं। देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें। 

प्रथा 

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें। 

 

कथा 

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोक कथा है, कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राज इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया। 

 

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है । यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं। 

 

 

धन्वंतरि 

धन्वन्तरि देवताओं के वैद्य हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए धनतेरस का दिन बहुत ही महत्व पूर्ण होता है। धनतेरस के संदर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या। दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हें परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके। 

 

एक दूत ने बातों ही बातों में तब यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है क्या। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यम देवता ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आँगन मे यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं। इस दिन लोग यम देवता के नाम पर व्रत भी रखते हैं। 

 

धनतेरस के दिन दीप जलाककर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें। भगवान धन्वन्तरी से स्वास्थ और सेहतमंद बनाये रखने हेतु प्रार्थना करें। चांदी का कोई बर्तन या लक्ष्मी गणेश अंकित चांदी का सिक्का खरीदें। नया बर्तन खरीदे जिसमें दीपावली की रात भगवान श्री गणेश व देवी लक्ष्मी के लिए भोग चढ़ाएं।

 


!! Wish you all a Happy Dhanteras !!
From,
Kalpesh Dave.

धनतेरस पर लक्ष्मी पूजन केसे करे - How to Perform the Laxmi Puja on Dhanteras

धनतेरस के शुभ मुर्हूत में ऐसे होंगी लक्ष्मी प्रसन्न:- 
How to Perform the Laxmi Puja on Dhanteras


भारतीय संस्कृति और धर्म में शंख का बड़ा महत्व है। विष्णु के चार आयुधो में शंख को भी एक स्थान मिला है। मन्दिरों में आरती के समय शंखध्वनि का विधान है। हर पुजा में शंख का महत्व है। यूं तो शंख की किसी भी शुभ मूहूर्त में पूजा की जा सकती है, लेकिन यदि धनत्रयोदशी के दिन इसकी पूजा की जाए तो दरिद्रता निवारण, आर्थिक उन्नति, व्यापारिक वृद्धि और भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए तंत्र के अनुसार यह सबसे सरल प्रयोग है।यह दक्षिणावर्ती शंख जिसके घर में रहता है, वहां लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है। यदि आप भी चाहते हैं कि आपके घर में स्थिर लक्ष्मी का निवास हो तो ये प्रयोग जरुर करें

ऊं श्रीं क्लीं ब्लूं सुदक्षिणावर्त शंखाय नम:………..उपरोक्त मंत्र का पाठ कर लाल कपड़े पर चांदी या सोने के आधार पर शंख को रख दें। आधार रखने के पूर्व चावल और गुलाब के फूल रखे। यदि आधार न हो तो चावल और गुलाब पुष्पों (लाल रंग) के ऊपर ही शंख स्थापित कर दें। तत्पश्चात निम्न मंत्र का 108 बार जप करें- “मंत्र – ऊं श्रीं”.
 
अ- 10 से 12 बजे के बीच उपरोक्त प्रकार से सवा माह पूजन करने से-लक्ष्मी प्राप्ति।
ब- 12 बजे से 3 बजे के बीच सवा माह पूजन करने से यश कीर्ति प्राप्ति, वृद्धि।
स- 3 से 6 बजे के बीच सवा माह पूजन करने से-संतान प्राप्तिइसके अन्य प्रयोग निम्न हैक. सवा महा पूजन के बाद इसी रंग की गाय के दूध से स्नान कराओ तो बन्ध्या स्त्री भी पुत्रवती हो जाती है।
ख. पूजा के पश्चात शंख को लाल रंग के वस्त्र मं लपेटकर तिजोरी में रख दो तो खुशहाली आती है।
ग. शंख को लाल वस्त्र से ढककर व्यापारिक संस्थान में रख दो तो दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि और लाभ होता है।


Wednesday, September 28, 2011

नवरात्री साधना एवं माता के चमत्कार (Navratri Upasna in Hindi)



नवरात्री साधना एवं माता के चमत्कार 
(Navratri Upasna)




माताजी की ये साधना आप पुरे दिन मे कभी भी करसकते है. 
  1. प्रातहकाल(Morning 4am to 12pm) मे पूजा करे तो लक्ष्मी स्थिर रहेगी और धन की प्राप्ति होगी, दारिद्रय दूर होगा. 
  2. संध्यांकाल(Evening 6pm to 12pm) मे पूजा करे तो लक्ष्मी स्थिर रहेगी और धन की प्राप्ति होगी, दारिद्रय दूर होगा, शत्रु का नास होगा, रुका हुआ धन मिलेगा, आरोग्य सुधरेगा.पितृ को शांति मिले गी, वहा भूत प्रेत, घर का दोष, आदि से मुक्त होंगे.
  3. रात्रिकाल(Night 12pm to 3am) मे पूजा करे तो घर या व्यक्ति के उप्पर किया कराया दोष दूर होगा, भूत प्रेत, जादू टोना टोटका, मुट मरण, वशीकरण, संबन, डाकिनी शाकिनी, पिचले जनम का दोष व आदि सारे दोष और बालाओं से मुक्त होंगे.

पूजा की सामग्री :-
  1. अबीर, गुलाल, कुमकुम, चन्दन.
  2. आंबे के लकडे का पाट (Mango Tree Wooden Table) Or (अनिय कोई लकड़े का पाट चलेगा)
  3. आंबे के पते का हार, हार माला, फुल, गजरा (वेणी), गुलाब (Rose)
  4. १ गिला नारियल (Coconut), १ सुखा नारियल (गोरा)
  5. रोली, मोली (नाडाछड़ी), चावल (अक्षत, Rice)
  6. कपूर, गुंगल धुप साथ मे कुछ काले कॉलसे(Coal), अगरबती, घी का दीपक.
  7. फल (दाडम), मिठाई, पेडा या हलवा माता को निवेद चाडावा, या माता की पसंदी सुखडी.
  8. पंचपात्र (Copper Plate),  चमच(Copper Spoon), वाटि (Copper small Bowl). (अगर नहीं हो तो सादे बर्तन भी चलेंगे)
  9. गंगाजल (पानी), अत्तर (Fragrance Perfume Bottle)
  10. लाल बलाउस पीस, लाल चुन्दडी, माताजी के श्रींगार का पेकेट ले.
  11. माताजी की प्रतिमा (मूर्ति या छवि)
  12. ताम्बे का कलश (कलश जल या गंगाजल से भरा हुआ)
  13. दाब आसन, लाल आसन, लाल धोती या केसरी (अगर स्त्री है तो सीर पर चुन्दडी रखे)

माता का प्रिय निवेद केसे बनाये (सुखडी) :-
सामग्री :- घी, गुड और गेहू का आटा, (अगर आपको उप्पेर से कुछ किसमिस, बादाम, काजू, केसर डालना है तो आप सजावट के लिए ड़ाल सकते हो)
क्रिया :-  छोटी कड़ाई लो, उसके अन्दर १/२ (आधा) कप घी डाले, उसे ५ से १० मीनिट गरम करे, जबी आपको लगे के घी गरम हो गया है, तो उसके अन्दर १/२ (आधा) कप जितना गुड डाले, जब तक गुड पिगले नहीं जाये तब तक हिलाते रहो, जब गुड पूरी तरह से पिगल (Liquid Form) जाये तब १ कप गेहू का आटा डाले, उसके बाद १५ से २० मीनिट तक हिलाते रहो. कुछ समय मे सुखडी थोड़ी कठन (Little Strong) हो जाएगी, उसके बाद चुला बन करदो और उस कड़ाई को निचे उत्तारे, एक बड़ी थाली लो, उसके उप्पेर घी लगाओ, फिर कड़ाई मे बनी हुए सुखडी थाली मे ड़ाल दो. उसके बाद सुखडी को पूरी थाली मे फैलावो (Spread), अब थाली मे रही सुखडी को बराबर से छोटे छोटे तुकडे करो (Do Small Small pieces). फिर सुखडी को १ घंटे के लिए ठंडा होने के लिए रखो. जब वो ठंडा हो जायेगा तभी आप सुखडी को माताजी को नेवेद धरो.
नोट :- ये निवेद खास करके नवरात्री के अस्टमी को माता के सामने धराते है. वहा ये माताजी की प्रिय निवेद है.


Vidhi (विधि) / Method of performing पूजा.
विधि :- पूजा प्रारंभ करने से पेले ना धोकर सुद्धा हो जाये, फिर धोती पहन ले, अगर स्त्री है तो अपने माथे (head) पर लाल चुन्दडी रखे, अब अम्बा का पाट लो (कोई भी लकड़े का पाट चलेगा अगर अम्बा का पाट नहीं है तो), उस पर लाल कपडा या बलाउस पीस बिछाओ, माताजी की मूर्ति या छवि रखो, माताजी को चुन्दडी चडावे, हार, फुल, वेणी (गजरा), संगार चडावे. अपना आसन बिछाये पहले दाब का और उसके उप्पर लाल उन का आसन (लाल आसन या अनिय कोई भी आसन चलेगा), आसन पर बेठे. अपने सामने सभी सामग्री रखे, पंचपात्र और गंगाजल ताम्बे के कलश मे भर कर रखे और माताजी का ध्यान करते हुए पूजा की विधि प्रारंभ दीपक को प्रज्वलित करके करे.

नोट:- गूगल का धुप सुबह, संध्या वहा रात्रि को आवसीय करे. अगर ये तीनी समय ना कर सके तो संध्या को आवसीय करे.


।। पवित्र करन ।।

पूर्वाभिमुख होकर बेठे, सब से पेले हम "पवित्र करन" इत्यादि मन्त्र से खुद को पवित्र करेंगे. बाया(Left) हाथ में जल ले और दाया(Right) हाथ से इस मंत्र को पड़ते पड़ते अपने सिर तथा शरीर पर छिड़क लें(Sprinkle the water on us).


ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।




।। आचमनम ।।
वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से साथ बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए । 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । 
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा । 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥


।। शिखावन्दनम ।। 
शिखा स्पर्श एवं वंदन - शिखा(Head) के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि देवी के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।  
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते । 
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥


।।  प्राणायाम: ।। 
श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है । श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ ।


।। न्यास: ।।
न्यास - इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जागृत करना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ (Left) हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने (Right) हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर  निचे बताए गए स्थान पर मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान् के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।
।। देवी आव्हान ।।  
देवी उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा अम्बा है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ अम्बा की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है ।

ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे
ब्रह्मवादिनि विदमहे दुर्गाच्छन्दसां मातः । 
शिव प्रियाये धीमहि, तन्नो दुर्गा: प्रचोदयात ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लिं चामुण्डाये विच्चे नमः । आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि ।

।। गुरु ध्यान ।। 
गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें ।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः । गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

माँ अम्बा व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें । 
 ये पाच वास्तुये देवी माँ के समक्ष रखे 

जल का अर्थ है - नम्रता-सहृदयता ।
अक्षत का अर्थ है - समयदान अंशदान । 
पुष्प का अर्थ है - प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास । 
धूप-दीप का अर्थ है - सुगंध व प्रकाश का वितरण, 
पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है - स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश ।
ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं । कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है ।
।। सूर्यार्घ्यदान ।।
सूरज देवता का ध्यान करे अगर संध्या के समाये साधना प्रारंभ के है तो दीपक देवता का ध्यान करे
ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥


।। संकल्प ।।
दाहिने(Right) हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें.
ॐ  विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विन्ष्णुराज्ञ्या प्रवर्तमानश्य. हे देवी जगदम्बा मे भारत के ____________ राज्य(Name of your State) के __________ वासरे(  Name of your city) ______________ गामे(Name of your town) रहता / रहती हु, आज ___________ मासे(Name of all मासे मतलब [त्री, कुर्तिका, भाद्रपद]), के ____________ पक्षे (कृष्ण / शुक्ल) ______________ तिथि (एकं, बिज, एकादशी etc..) ____________ वार (सोमवार, सनिवार etc..) को मे ____________ नामा अहम् (Name of your) ___________ गोत्रौत्पन (Your Gotra Name eg. Kashyab, Haritatsat or Gautam), मे यह संकल्प करता / करती हु __________________________ (आप अपनी इछाये देवी के समक्ष कहो)(Tell your wishes, the purpose for which you are taking this sankalp) लेता / लेती हु. और फिर हाथ मे लिया हुआ जल और फुल देवी के समक्ष अर्पण करो. इस तरह से आपका संकल्प पूरा हुआ और ये सिर्फ पहेले दिन ही (First day) लेना है.


।। आगे की विधि ।।
संकल्प लेने के बाद देवी का ध्यान करे और फिर आपको जो कोई देवी का पाठ(जेसे की दुर्गा सप्तसती, दुर्गा चालीसा, गायत्री चालीसा, श्री शुक्तं, इत्यादि...) या फिर जाप रुपे कोई भी देवी का मंत्र(ॐ दूं दुर्गाये नमः, ॐ ऐं ह्रीं क्लिं चामुण्डाये विच्चे, या गायत्री मंत्र) कर सकते है. हर एक पाठ या एक जाप माला समाप्त होने के बाद समष्क रखे हुए कलश मे फुक मारे. जब आपके पाठ या जाप ७ बार पूर्ण होजाए उसके पश्चात वह पानी से भरा हुआ कलश घर मे रखे हुए पानी के मटके मे ड़ाल दो, और सभी घर के सदसिय उस पानी को पिए, अगर आपको उस जल से अपने घर को भी पवित्र और देवी से रक्षा कवच घर मे करना चाहते है तो अंत मे थोडा जल बचाकर रखे और घर के सभी कोने, दीवारों और दुवार के उमरा पर वो अभिमंत्रित किया हुआ जल छिडके.(Sprinkle the water every where in your home walls & Door's).उसके बाद माताजी की आरती करे और अंत मे गुंगल धुप करे और पुरे घर को वहा घर के सभी सदस्या को वो धुप दे. यह क्रिया आपको १० दिन तक लगातार करनी होंगी.
नोट:-हर रोज जब आप पाठ या जाप करने को बेठे तो देवी का ध्यान करे और आपने आपको पवित्र कारन करके पूजा प्रारंभ करे. 
।। जप या पाठ करते वक्त क्या ध्यानमे रखे ।।
पाठ या जाप करते समय होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । पाठ या जाप की प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।
 
अगर आप पाठ या जाप मे से कोई बी एक क्रिया कर रहे हो, तो वह आपको हर रोज ७ बार पाठ पड़ना(Reading) या जाप की ७  मालाए करनी होंगी. इस तरह से आपको लगातार नवरात्री के १० दिन तक करना होगा. ८ अष्टमी के दिन माता को निवेद चडावे(सुखडी).

अगर आपकी इछा है तो कन्या को भोजन करानेकी, तो ८ छोटी कन्या (८ से ज्यादा होगी तो चलेगा मगर कम नहीं होनी चाहिए)  और २ लड़के ( all below the age of 10) years) को बुलावे और उनको भोजन करावे, आरती उत्तारे, और उन्हें कोई तोफे(Gift) या दक्षिणा दे.
१० दिन को आपके पाठ या जाप समाप्त होने के बाद आप संकल्प छोड़ेंगे. 
।। संकल्प छोड़ने की विधि ।।
संकल्प छोड़ने के लिए दाया हाथ (Right Hand) मे चावल ले. फिर अपने भावना अनुसार देवी के मूर्ति के समक्ष क्षमा याचना करे की अगर मेरे से कोई भूल या कोई टूटी रहगयी हो तो मुझे नादान , नासमाज बालक मानकर क्षमा करे और मेरे परिवार पर सदेव आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे. यह बोल कर अक्षत (चावल / rice) माँ के छवि या मूर्ति पर अर्पण करे. 
माँ से कहे के "हे देवी मई माँ आप जहा से आये थे वहा वापस लोट जाओ"
नोट:-अगर आपको को देवी के मूर्ति मे से प्राण को वापसी नहीं भेजना हो तो देवी की मूर्ति या छवि को लेकर मंदिर मे रखे और फिर अक्षत(Rice) को पाठ पर छोड़ दे.
मंत्र:- गछ गछ या देवी तू गच्यान्ति..  
११ वे दिन सुबह को मूर्ति या छवि को मंदिर मे स्थापित करे.

।। ध्यान केसे करे ।।
मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में देवी माँ के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में देवी का स्मरण करने से उनके के  स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है ।

(उपासक)
लिखित,
कलपेश दावे.