Friday, September 16, 2011

काली-शाबर-मन्त्र

काली-शाबर-मन्त्र


Kali Kali Maha kali, Inder ki beti Brahma ki sali
Piti bhar bhar rakt payali, ud baithi pipal ki dali
Dono hath bajai tali, Jahan jai vajra ki tali,
Vahan na aye dushman hali,
Duhai kamro kamakhya naina yogni ki,
Ishwar mahadev gora parvti ki,
Duhai veer masan ki.


Vidhi- 40 din 108 bar roj jap kar sidh kare, paryog ke time padh kar teen bar jor se tali bajaye, jahan tak tali ki awaj jayegi, dushman ka koi var ya bhoot pret asar nahi karega.


“काली काली महा-काली, इन्द्र की बेटी, ब्रह्मा की साली। पीती भर भर रक्त प्याली, उड़ बैठी पीपल की डाली। दोनों हाथ बजाए ताली। जहाँ जाए वज्र की ताली, वहाँ ना आए दुश्मन हाली। दुहाई कामरो कामाख्या नैना योगिनी की, ईश्वर महादेव गोरा पार्वती की, दुहाई वीर मसान की।।”
 

विधिः- प्रतिदिन १०८ बार ४० दिन तक जप कर सिद्ध करे। प्रयोग के समय पढ़कर तीन बार जोर से ताली बजाए। जहाँ तक ताली की आवाज जायेगी, दुश्मन का कोई वार या भूत, प्रेत असर नहीं करेगा।

Thursday, September 1, 2011

गणेशोत्सव - Ganesh Chatruthi Festival

गणेशोत्सव (गणेश + उत्सव) हिन्दुओं का एक उत्सव है। वैसे तो यह कमोबेश पूरे भारत में मनाया जाता है, किन्तु महाराष्ट्र का गणेशोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र में भी पुणे का गणेशोत्सव जगत्प्रसिद्ध है। यह उत्सव, हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतुर्दशी (चार तारीख से चौदह तारीख तक) तक दस दिनों तक चलता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी भी कहते हैं।

गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप में व्याप्त है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। दक्षिण भारत में इनकी विशेष लोकप्रियता ‘कला शिरोमणि’ के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य-मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएं हैं।

गणेश हिन्दुओं के आदि आराध्य देव है। हिन्दू धर्म में गणेश को एक विशष्टि स्थान प्राप्त है। कोई भी धार्मिक उत्सव हो, यज्ञ, पूजन इत्यादि सत्कर्म हो या फिर विवाहोत्सव हो, निर्विध्न कार्य सम्पन्न हो इसलिए शुभ के रूप में गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है। महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथमा चलायी थी। छत्रपति शिवाजी महाराज भ गपश की उपासना करते थे।
  
इतिहास
पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थपना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणोत्सव को को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक के प्रयास से पहले गणेश पूजा परिवार तक ही सीमित थी। पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक पौधरोपण किया था वह अब विराट वट वृक्ष का रूप ले चुका है। वर्तमान में केवल महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफी संख्या में गणेशोत्सव मंडल है। 

स्वतंत्रता संग्राम और गणेशोत्सव  
वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में ‘मित्रमेला’ संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम था देशभक्तिपूर्ण पोवाडे (मराठीनागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का नया ही आंदोलन छेड़ दिया था। अंग्रेज भी इससे घबरा गये थे। इस बारे में रोलेट समिति रपट में भी चिंता जतायी गयी थी। रपट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेजी शासन विरोधी गीत गाती हैं व स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता है। गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे - वीर सावकर, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्ट चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू। लोकगीतों का एक प्रकार) आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। इस संस्था के पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए लोगों उमड़ पड़ते थे। राम-रावण कथा के आधार पर वे लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। उनके बारे में वीर सावरकर ने लिखा है कि कवि गोविंद अपनी कविता की अमर छाप जनमानस पर छोड़ जाते थे। गणेशोत्सव का उपयोग आजादी की लड़ाई के लिए किए जाने की बात पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। बाद में


गणेश चतुर्थी व्रत कथा - Ganesh Chaturthi Varth Katha (Story)

गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह त्योहार महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता हैं। गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी (अनंत चौदस) तक दस दिन गणेशोत्सव मनाया जाता है।

 

 पुराणानुसार

शिवपुराणमें भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्तिगणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेशपुराणके मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था।

 

कथा

शिवपुराणके अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपालबना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर!तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्यदेकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्षपर्यन्तश्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

 

अन्य कथा

एक बार महादेवजी पार्वती सहित नर्मदा के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेवजी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तब शिवजी ने कहा- हमारी हार-जीत का साक्षी कौन होगा? पार्वती ने तत्काल वहाँ की घास के तिनके बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा?

 

 खेल आरंभ हुआ। दैवयोग से तीनों बार पार्वती जी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेवजी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वती जी ने क्रुद्ध होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का शाप दे दिया।


बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानवश ऐसा हो गया है। मैंने किसी कुटिलता या द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा शाप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने आएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं।

एक वर्ष बाद वहाँ श्रावण में नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेश व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया। तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुँच सकूं और वे मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ।

गणेशजी 'तथास्तु' कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी ने उससे वहाँ तक पहुँचने के साधन के बारे में पूछा।

तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। उधर उसी दिन से अप्रसन्न होकर पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह २१ दिन पर्यन्त श्रीगणेश का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई।

वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- भगवन! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ गई हूँ। शिवजी ने 'गणेश व्रत' का इतिहास उनसे कह दिया।

तब पार्वतीजी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वतीजी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया।

कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया। विश्वामित्रजी ने व्रत करके गणेशजी से जन्म से मुक्त होकर 'ब्रह्म-ऋषि' होने का वर माँगा। गणेशजी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। ऐसे हैं श्री गणेशजी, जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं। 

तीसरी कथा
एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम 'गणेश' रखा। पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ। मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया।

तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए है? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।

यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया।

यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

 व्रत

भाद्रपद-कृष्ण-चतुर्थी से प्रारंभ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चंद्रोदयव्यापिनीचतुर्थी के दिन व्रत करने पर विघ्नेश्वरगणेश प्रसन्न होकर समस्त विघ्न और संकट दूर कर देते हैं।

चंद्र दर्शन दोष से बचाव

प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रदर्शन के पश्चात्‌ व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है।
जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है। इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-
'सिहः प्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥'


गणेश चतुर्थी व्रत - Ganesh Chaturthi Vart

 
भाद्रपद शुक्ल की चतुर्थी ही गणेश चतुर्थी कहलाती है। श्री गणेशजी विघ्न विनाशक हैं। इन्हें देवसमाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेशजी का जन्म हुआ था। श्री गणेशजी बुद्धि के देवता हैं। गणेशजी का वाहन चूहा है। ऋद्धि तथा सिद्धि इनकी दो पत्नियाँ हैं। इनका सर्वप्रिय भोग मोदक (लड्डू) है। इस दिन रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से मिथ्या कलंक लग जाता है।
 गणेश चतुर्थी व्रत कैसे करे
* इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ।* पश्चात 'मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये' मंत्र से संकल्प लें।* इसके बाद सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर से गणेशजी की प्रतिमा बनाएँ।* गणेशजी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर मुँह पर कोरा कपड़ा बाँधकर उस पर स्थापित करें।* पश्चात मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से उनका पूजन करें।* इसके बाद आरती करें। आरती के लिए क्लिक करें। * फिर दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डुओं का भोग लगाएँ। इनमें से पाँच लड्डू गणेशजी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बाँट दें।
 गणेश चतुर्थी व्रत में सावधानिया
* गणेशजी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए।* पूजनोपरांत नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। नीची नजर से चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है कि जहाँ तक संभव हो, इस दिन (भाद्रपद चतुर्थी को) चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है। यदि सावधानी बरतने के बावजूद चंद्र दर्शन हो ही जाएँ तो फिर स्यमन्तक की कथा सुनने से कलंक का प्रभाव नहीं रहता।

गणेश चतुर्थी व्रत फ
वस्त्र से ढंका हुआ कलश, दक्षिणा तथा गणेश प्रतिमा आचार्य को समर्पित करके गणेशजी के विसर्जन का उत्तम विधान माना गया है। गणेशजी का यह पूजन करने से बुद्धि और ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।

Monday, August 22, 2011

॥ मनोवांछित फलप्राप्ति हेतु कृष्ण-मंत्र ॥

॥ मनोवांछित फलप्राप्ति हेतु कृष्ण-मंत्र ॥


जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर श्रीकृष्ण के विभिन्न मंत्र दिए जा रहे हैं। इन मंत्रों के जाप से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। शुभ प्रभाव बढ़ाने व सुख प्रदान करने में ये मंत्र अत्यन्त प्रभावी माने जाते हैं। पाठकों की सुविधा के लिए मंत्र से संबंधित जानकारी भी यहाँ दी गई है।

भगवान श्रीकृष्ण का मूलमंत्र :
'
कृं कृष्णाय नमः'
यह श्रीकृष्ण का मूलमंत्र है। इस मूलमंत्र का जाप अपना सुख चाहने वाले प्रत्येक मनुष्य को प्रातःकाल नित्यक्रिया व स्नानादि के पश्चात एक सौ आठ बार करना चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य सभी बाधाओं एवं कष्टों से सदैव मुक्त रहते हैं।

सप्तदशाक्षर श्रीकृष्णमहामन्त्र :
'
ऊँ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा'
यह श्रीकृष्ण का सप्तदशाक्षर महामंत्र है। इस मंत्र का पाँच लाख जाप करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। जप के समय हवन का दशांश अभिषेक का दशांश तर्पण तथा तर्पण का दशांश मार्जन करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। जिस व्यक्ति को यह मंत्र सिद्ध हो जाता है उसे सबकुछ प्राप्त हो जाता है।

सात अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मंत्र :
'
गोवल्लभाय स्वाहा'
इस सात(7) अक्षरों वाले श्रीकृष्ण मंत्र का जाप जो भी साधक करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

आठ अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
गोकुल नाथाय नमः'
इस आठ(8) अक्षरों वाले श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसकी सभी इच्छाएँ व अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं।

दशाक्षर श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः'
यह दशाक्षर(10) मन्त्र श्रीकृष्ण का है। इसका जो भी साधक जाप करता है उसे संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

द्वादशाक्षर श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय'
इस कृष्ण द्वादशाक्षर(12) मन्त्र का जो भी साधक जाप करता है, उसे इष्ट सिद्धी की प्राप्ति हो जाती है।

बाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र :
'
ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविंदाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ॥
यह बाईस(22) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसे वागीशत्व की प्राप्ति होती है।

तेईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री'
यह तेईस(23) अक्षरों वाला श्रीकृष्ण का मंत्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसकी सभी बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

अट्ठाईस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'
यह अट्ठाईस(28) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। जो भी साधक इस मंत्र का जाप करता है उसको समस्त अभिष्ट वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

उन्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'
लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा।'
यह उन्तीस(29) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक एक लाख जप और घी, शकर तथा शहद में तिल व अक्षत को मिलाकर होम करते हैं, उन्हें स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

बत्तीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'नन्दपुत्राय श्यामलांगाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।'
यह बत्तीस(32) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक एक लाख बार जाप करता है तथा पायस, दुग्ध व शकर से निर्मित खीर द्वारा दशांश हवन करता है उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।


तैंतीस अक्षरों वाला श्रीकृष्ण मन्त्र :
'ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥'
यह तैंतीस(33) अक्षरों वाला श्रीकृष्णमन्त्र है। इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी साधक जाप करता है उसे समस्त प्रकार की विद्याएं निःसंदेह प्राप्त होती हैं।

कृष्ण स्मरण का महत्व

कृष्ण स्मरण का महत्व
 श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌ से कहते हैं-

सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।
न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः
 
जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में भी नहीं होते।

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।
सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌
 
श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।

पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसंभवान्‌।
सर्वान्हरित चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः
 
भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जब चित्त में विराजते हैं, तब उनके प्रभाव से कलियुग के सारे पाप और द्रव्य, देश तथा आत्मा के दोष नष्ट हो जाते हैं।

शय्यासनाटनालाप्रीडास्नानादिकर्मसु।
न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः
 
श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व समझने वाले भक्त श्रीकृष्ण में इतने तन्मय रहते थे कि सोते, बैठते, घूमते, फिरते, बातचीत करते, खेलते, स्नान करते और भोजन आदि करते समय उन्हें अपनी सुधि ही नहीं रहती थी।

वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-
शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।
ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ
तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्‌
 
जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक आदि राजा वैरभाव से ही खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर वक्त श्री हरि की चाल, उनकी चितवन आदि का चिन्तन करने के कारण मुक्त हो गए, तो फिर जिनका चित्त श्री कृष्ण में अनन्य भाव से लग रहा है, उन विरक्त भक्तों के मुक्त होने में तो संदेह ही क्या है?

एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः।
जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा
 
श्रीकृष्ण से द्वेष करने वाले समस्त नरपतिगण अन्त में श्री भगवान के स्मरण के प्रभाव से पूर्व संचित पापों को नष्ट कर वैसे ही भगवद्रूप हो जाते हैं, जैसे पेशस्कृत के ध्यान से कीड़ा तद्रूप हो जाता है, अतएव श्रीकृष्ण का स्मरण सदा करते रहना चाहिए।

श्रीकृष्णाष्टकम्‌ - Krishnashtakam

श्रीकृष्णाष्टकम्‌
कृष्ण जन्माष्टमी पर्व 

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं
स्वभक्त-चित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्‌।
सुपिच्छ-गुच्छ-मस्तकं सुनाद-वेणुहस्तकं
ह्यनंग-रंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्‌॥1॥
मनोजगर्वमोचनं विशाल-लोल-लोचनं
विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्‌।
करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं
महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम्‌॥2
कदम्बसूनुकुण्डलं सुचारु-गण्ड-मण्डलं
व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्‌।
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया
युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्‌॥3॥
सदैव पादपंकजं मदीयमानसे निजं
दधानमुत्तमालकं नमामि नन्दबालकम्‌।
समस्त-दोष-शोषणं समस्तलोकपोषणं
समस्तगोपमानस नमामि कृष्णलालसम्‌॥4॥
भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं
यशोमतीकिशोरकं नमामि दुग्धचोरकम्‌।
दृगन्तकान्तभंगिनं सदासदालसंगिनं
दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्‌॥5॥
गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपावरं
सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम्‌।
नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं
नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्‌॥6
समस्तगोपनंदनं हृदम्बुजैकमोहनं
नमामि कुंजमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम्‌।
निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं
रसालवेणुगायकं नमामि कुंजनायकम्‌।7॥
विग्दध-गोपिकामनो-मनोज्ञ-तल्पशायिनं
नमामि कुंजकानने प्रवृद्ध-वह्नि-पायिनम्‌।
यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा
मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्‌।
प्रमाणिकाष्टकद्वय जपत्यधीत्य यः पुमान्‌
भवेत्‌ स नन्द-नन्दने भवे भवे सुभक्तिमान्‌॥8॥
॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम्‌ ॥

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥
 दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुणअधरजनु बिम्बफल, नयनकमलअभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज
जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नट-नागर, नाग नथइया॥
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।
कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्‌यो।
अका बका कागासुर मार्‌यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्‌यो रिसाई।
मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्‌यो।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्‌यो॥
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्‌यो।
भक्तन के तब कष्ट निवार्‌यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्‌यो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्‌यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।
लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।
शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया।
डूबत भंवर बचावइ नइया॥
'
सुन्दरदास' आस उर धारी।
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥ 

जन्माष्टमी (Janmashtami)

 जन्माष्टमी (Janmashtami)

Janmashtami celebrates the birth of one of the most famous Gods of Hindu religion, Bhagwan Krishna, on the eighth day (Ashtami) in the month of Sravana or Savana. Lord Sri Krishna was born on the 'Rohini' nakshatram (star). It is generally celebrated in the month of August-September according to the Christian Calendar. Legend has it that Sri Krishna was born on a dark, stormy and windy night to end the rule and atrocities of his maternal uncle, Kansa.

Position of Stars at the time of Birth

It was only on the eighth day of the second fortnight, in the month of Sravana when, the moon entered the house of Vrishabha in Rohini Nakshatra (star) that Lord appeared. According to Barhapatyamana, the month of Sravana corresponds to the month of Bhadrapada Krishnapaksha. Lord was born in the year of Visvavasu, appx. 5,227 years ago.

Celebrated for over Two Days

Janmashtami is celebrated for over two days as “Rohini” nakshatra and Ashtami may not fall on the same day. The first day known as Krishnashtami, as the birth of Bhagwan Krishna falls on the eighth day after Raksha Bandhan, which generally falls in the month of August. The second day is known as Kalashtami.

Welcome the Lord at Midnight

It is only at midnight between the first and the second day that birth of Sri Krishna took place. The actual festivities begin during midnight in this 48 hour period. The celebration reaches its peak at midnight, with the birth of Lord Krishna, with lot of hymns, arti taking place and blowing of the Conch (shankh), rocking the cradle of Lord. The idol of lord is bathed with Panchamrit (A mixture of milk, ghee, oil, honey and Gangajal). The Panchamrit is later distributed as Prasad to the devotees along with other sweets. While some Fast on the first day and break it at midnight for others the fasting continues for both days. The period coin
cides with rainy season.

Thursday, August 4, 2011

कालसर्प शान्ति के लिये नाग पंचमी पूजा- Nag Panchmi 2011: Kalsarp Dosha shanti

नाग पंचमी की विशेषता - Speciality of Nag Panchmi
 
 
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. पूर्ण श्रवण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता है. इसलिये इस दिन भूमि में हल चलाना, नींव खोदना शुभ नहीं माना जाता है. भूमि में नाग देवता का घर होना है.  भूमि के खोदने से नागों को कष्ट होने की की संभावनाएं बनती है.

नाग पंचमी के उपवास की विधि -  Nag Panchmi Upvas Vidhi
देश के कई स्थानों पर नाग पंचमी कृ्ष्ण पक्ष की पंचमी भी मनाई जाती है. नाग पंचमी में नाग देवताओं के लिये व्रत रखा जाता है. इस व्रत में पूरे दिन उपवास रख कर सूर्य अस्त होने के बाद नाग देवता की पूजा के लिये खीर के रुप में प्रसाद बनाया जाता है उस खीर को सबसे पहले नाग देवता की मूर्ति अथवा शिव मंदिर में जाकर भोग लगाया जाता है, उसके बाद इस खीर को प्रसाद के रुप में स्वयं ग्रहण किया जाता है. उपवास समाप्ति के भोजन में नमक व तले हुए भोजन का प्रयोग करना वर्जित होता है. इस दिन उपवास से संबन्धित सभी नियमों का पालन करना चाहिए.

दक्षिण भारत में नाग पंचमी का अलग रुप - Nag Panchmi in South India
भारत के दक्षिण क्षेत्रों में श्रवण, शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी में शुद्ध तेल से स्नान किया जाता है. तथा वहां अविवाहित कन्याएं उपवास रख, मनोवांछित जीवन साथी की प्राप्ति की कामना करती है.

नाग पंचमी में बासी भोजन ग्रहण करने का विधान
नाग पंचमी के दिन मात्र पूजा में प्रयोग होने वाला भोजन ही तैयार किया जाता है. बाकि भोजन एक दिन पहले ही बनाया जाता है. परिवार के जो सदस्य उपवास नहीं रखते है. उन्हें बासी भोजन ही ग्रहण करने के लिये दिया जाता है. खीर के अलावा चावल-सैवई ताजे भोजन में बनाये जाते है.

मुख्य द्वार पर नाग देवता की आकृ्ति पूजा - Nag Devda Puja on Nag Panchami
देश के कुछ भागों में 14 अगस्त नाग पंचमी के दिन उपवासक अपने घर की दहलीज के दोनों ओर गोबर से पांच सिर वाले नाग की आकृ्ति बनाते है. गोबर न मिलने पर गेरू का प्रयोग भी किया जा सकता है. इसके बाद नाग देवता को दूध, दुर्वा, कुशा, गन्ध, फूल, अक्षत, लड्डूओं सहित पूजा करके नाग स्त्रोत

या निम्न मंत्र का जाप किया जाता है.
" ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा"

इस मंत्र की तीन माला जाप करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. नाग देवता को चंदन की सुगंध विशेष प्रिय होती है. इसलिये पूजा में चंदन का प्रयोग करना चाहिए. इस दिन की पूजा में सफेद कमल का प्रयोग किया जाता है.  उपरोक्त मंत्र का जाप करने से "कालसर्प योग' दोष की शान्ति भी होती है.

मनसा देवी को प्रसन्न करना Worsipping of Godess Mansa Devi
उतरी भारत में श्रवण मास की नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है. देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये बंगाल, उडिसा और अन्य क्षेत्रों में मनसा देवी के दर्शन व उपासना का कार्य किया जाता है.

काल-सर्प योग की शान्ति - Kal Sarp Dosha Shanti Remedies
14 अगस्त 2010, शुक्ल पक्ष, श्रवण मास के दिन जिन व्यक्तियों की कुण्डली में "कालसर्प योग' बन रहा हों, उन्हें इस दोष की शान्ति के लिये उपरोक्त बताई गई विधि से उपवास व पूजा-उपासना करना, लाभकारी रहता है. काल सर्प योग से पीडिय व्यक्तियों को इस दिन नाग देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए.

नाग-पंचमी में क्या न करें
नाग देवता की पूजा उपासना के दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए. उपासक चाहें तो शिव लिंग को दूध स्नान करा सकते है. यह जानते हुए कि दूध पिलाना नागों की मृ्त्यु का कारण बनता है. ऎसे में उन्हें दूध मिलाना अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान होता है. इसलिये भूलकर भी ऎसी गलती करने से बचना चाहिए. इससे श्रद्धा व विश्वास के पर्व में जीव हत्या करने से बचा जा सकता है.
" ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा"

इस मंत्र की तीन माला जाप करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. नाग देवता को चंदन की सुगंध विशेष प्रिय होती है. इसलिये पूजा में चंदन का प्रयोग करना चाहिए. इस दिन की पूजा में सफेद कमल का प्रयोग किया जाता है.  उपरोक्त मंत्र का जाप करने से "कालसर्प योग' दोष की शान्ति भी होती है.

मनसा देवी को प्रसन्न करना Worsipping of Godess Mansa Devi
उतरी भारत में श्रवण मास की नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है. देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये बंगाल, उडिसा और अन्य क्षेत्रों में मनसा देवी के दर्शन व उपासना का कार्य किया जाता है.

काल-सर्प योग की शान्ति - Kal Sarp Dosha Shanti Remedies
4 अगस्त 2011, शुक्ल पक्ष, श्रवण मास के दिन जिन व्यक्तियों की कुण्डली में "कालसर्प योग' बन रहा हों, उन्हें इस दोष की शान्ति के लिये उपरोक्त बताई गई विधि से उपवास व पूजा-उपासना करना, लाभकारी रहता है. काल सर्प योग से पीडिय व्यक्तियों को इस दिन नाग देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए.

नाग-पंचमी में क्या न करें
नाग देवता की पूजा उपासना के दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए. उपासक चाहें तो शिव लिंग को दूध स्नान करा सकते है. यह जानते हुए कि दूध पिलाना नागों की मृ्त्यु का कारण बनता है. ऎसे में उन्हें दूध मिलाना अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान होता है. इसलिये भूलकर भी ऎसी गलती करने से बचना चाहिए. इससे श्रद्धा व विश्वास के पर्व में जीव हत्या करने से बचा जा सकता है.

नागपंचमी पूजा का विधान

नागपंचमी पूजा का विधान


इस दिन ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान कर घर के दरवाजे पर या पूजा के स्थान पर गोबर से नाग बनाया जाता है। दूध, दुबी, कुशा, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि से नाग देवता की पूजा की जाती है लड्डू और मालपुआ का भोग बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्प को दूध से स्नान कराने से सांप का भय नहीं रहता । 

मेरा कहना है कि जिनके कुंडली में कालसर्प का योग रहता है उसे विशेषकर इस दिन नागदेवता की पूजा करनी चाहिए। भारत के अलग=अलग प्रांत में इसे अलग=अलग तरह से मनाया जाता है। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और बंगाल में इसे विशेष रूप से मनाया जाता है।

पश्चिम बंगाल और असम तथा उड़ीसा के कुछ भागों में इस दिन नागों की देवी मां मनसा की अराधना की जाती है। केरला के मंदिरों में इस दिन शेषनाग की विशेष पूजा अर्चना होती है।


इस दिन सरस्वती देवी की भी पूजा की जाती है और बौद्धिक कार्य किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर इस दिन घर की महिलाएं उपवास रखें और विधि विधान से नाग देवता की पूजा करें तो परिवार को सर्पदंश का भय नहीं रहता ।

 

Monday, August 1, 2011

शिव को प्रिय श्रावण मास

शिव को प्रिय श्रावण मास


पद्म पुराण के पाताल खंड के अष्टम अध्याय में ज्योतिर्लिंगों के बारे में कहा गया है कि जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उनकी समस्त कामनाओं की इच्छा पूर्ति होती है। स्वर्ग और मोक्ष का वैभव जिनकी कृपा से प्राप्त होता है।

शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की नगरी का भार है। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि प्रलय आने पर भी काशी को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी।

भारत में शिव संबंधी अनेक पर्व तथा उत्सव मनाए जाते हैं। उनमें श्रावण मास भी अपना विशेष महत्व रखता है। संपूर्ण महीने में चार सोमवार, एक प्रदोष तथा एक शिवरात्रि, ये योग एकसाथ श्रावण महीने में मिलते हैं। इसलिए श्रावण का महीना अधिक फल देने वाला होता है। इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ाई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :

प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।

महिलाएँ श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना एवं व्रत अपने पति की लंबी आयु के लिए करती हैं। सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण, कार्तिक और माघ मास में किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति सत्रहवें सोमवार को सोलह दम्पति (जो़ड़ों) को भोजन एवं किसी वस्तु का दान देकर उद्यापन किया जाता है।

शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।

शिव का ग्यारहवाँ अवतार हनुमान के रूप में हुआ है। संपूर्ण श्रावणमास में शिव भक्तों द्वारा शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। श्रावण मास में इसके करने से अधिक फल प्राप्त होता है।

श्रावण मास : भगवान भोले नाथ की आराधना

राशि अनुसार ऐसे करें श्रावण में भगवान भोले नाथ की आराधना

मेष राशि:- अगर आपके पारिवारिक जीवन में समस्या है, दांपत्य सुख नहीं हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तो श्रावण मास में हर रोज बेलपत्र पर लाल चंदन से नम: शिवाय लिखें। इसी मंत्र का जाप करते हुए जलाभिषेक करें। तत्पश्चात यह बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

वृषभ राशि:- वृषभ राशि वाले कार्य सिद्धि व लाभ प्राप्ति के लिए नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत सर्वप्रथम शिवलिंग गंगाजल और दही से अभिषेक करें। उसके बाद कच्चा दूध चढ़ाएं। तत्पश्चात जल की धारा के साथ द्वादश ज्योर्तिलिंगों के मंत्रों का उच्चारण करें। शिवलिंग पर श्वेत चंदन से तिलक करें और हारसिंगार के पुष्प अर्पित करें।

मिथुन राशि:- मिथुन राशि का स्वामी बुध और चंद्रमा के हमेशा आपस बैर रहा है। यदि आपकी जन्मकुंडली में चंद्रमा कमजोर है। आपकी मानसिक अवस्था अस्थिर रहती है। कारोबारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, कारोबार में बचत नहीं हो रही है तो श्रावण महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत ऊँ नम: शिवाय का जाप करते हुए गंगाजल में श्रद्धानुसार शहद मिलाकर अभिषेक करें।

कर्क राशि:- कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा जो भगवान शिव का प्रिय श्रृंगार हैं। जीवन में कोई भी समस्या हो उन समस्याओं के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत गंगाजल, दूध व मिश्री मिलाकर ऊँ चंद्र मोलेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

सिंह राशि:- सिंह राशि वाले लोग शत्रु संबंधी समस्या का निवारण, वर्चस्व प्राप्ति, कारोबार में लाभ प्राप्ति एवं पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत श्रद्धानुसार शुद्ध देसी घी से ऊँ  अनंनताय नम: मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव के शिवलिंग पर अभिषेक करें।

कन्या राशि:- कन्या राशि वाले लोग व्यवसाय में हानि से बचने, नौकार में सफलता पाने व पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत ऊँ त्रिमूर्तितेय नम: मंत्र का जाप करते हुए दूध, घी और शहद से अभिषेक करें। 

तुला राशि:- तुला राशि वाले लोग दांपत्य सुख, व्यवसाय वृद्धि एवं संतान सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत दही और गन्ने के रस से शिवलिंग पर ऊँ श्री कंठाय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

वृश्चिक राशि:- वृश्चिक राशि वाले अपनी जीवन की संपूर्ण सफलता के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत तीर्थ स्थान के जल में दूध और शक्कर मिलाकर ऊँ नम: शिवाय कालं महाकाल कालं कृपालं ऊं नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

धनु राशि:- धनु राशि वाले मनोवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत गंगा जल, कच्चे दूध व केसर मिलाकर ऊँ महेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

मकर राशि:- मकर राशि वाले व्यवसाय में सफलता, पारिवारिक जीवन सुख व मनोनुकूल कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत बादाम के तेल से ऊँ सर्वभूतहराय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

कुंभ राशि:- कुंभ राशि वाले लोग परिवार में कष्ट हो, कारोबार में हानि हो, शारिरिक परेशानियों के निवारण हेतु श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत घी, शहद और शक्कर से ऊँ अव्यक्ताय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

 मीन राशि:- मीन राशि वाले संपूर्ण विघ् और परेशानियों के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत कच्चे दूध, केसर और तीर्थ जल मिलाकर ऊँ सर्वलोक प्रजापतये नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।