Monday, August 22, 2011

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥

॥ श्रीकृष्ण चालीसा ॥
 दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुणअधरजनु बिम्बफल, नयनकमलअभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज
जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नट-नागर, नाग नथइया॥
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे।
कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्‌यो।
अका बका कागासुर मार्‌यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्‌यो रिसाई।
मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो।
गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्‌यो।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्‌यो॥
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो।
मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी।
लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा।
जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्‌यो।
भक्तन के तब कष्ट निवार्‌यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्‌यो।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्‌यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।
लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।
शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।
उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।
दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया।
डूबत भंवर बचावइ नइया॥
'
सुन्दरदास' आस उर धारी।
दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।
क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।
बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥ 

जन्माष्टमी (Janmashtami)

 जन्माष्टमी (Janmashtami)

Janmashtami celebrates the birth of one of the most famous Gods of Hindu religion, Bhagwan Krishna, on the eighth day (Ashtami) in the month of Sravana or Savana. Lord Sri Krishna was born on the 'Rohini' nakshatram (star). It is generally celebrated in the month of August-September according to the Christian Calendar. Legend has it that Sri Krishna was born on a dark, stormy and windy night to end the rule and atrocities of his maternal uncle, Kansa.

Position of Stars at the time of Birth

It was only on the eighth day of the second fortnight, in the month of Sravana when, the moon entered the house of Vrishabha in Rohini Nakshatra (star) that Lord appeared. According to Barhapatyamana, the month of Sravana corresponds to the month of Bhadrapada Krishnapaksha. Lord was born in the year of Visvavasu, appx. 5,227 years ago.

Celebrated for over Two Days

Janmashtami is celebrated for over two days as “Rohini” nakshatra and Ashtami may not fall on the same day. The first day known as Krishnashtami, as the birth of Bhagwan Krishna falls on the eighth day after Raksha Bandhan, which generally falls in the month of August. The second day is known as Kalashtami.

Welcome the Lord at Midnight

It is only at midnight between the first and the second day that birth of Sri Krishna took place. The actual festivities begin during midnight in this 48 hour period. The celebration reaches its peak at midnight, with the birth of Lord Krishna, with lot of hymns, arti taking place and blowing of the Conch (shankh), rocking the cradle of Lord. The idol of lord is bathed with Panchamrit (A mixture of milk, ghee, oil, honey and Gangajal). The Panchamrit is later distributed as Prasad to the devotees along with other sweets. While some Fast on the first day and break it at midnight for others the fasting continues for both days. The period coin
cides with rainy season.

Thursday, August 4, 2011

कालसर्प शान्ति के लिये नाग पंचमी पूजा- Nag Panchmi 2011: Kalsarp Dosha shanti

नाग पंचमी की विशेषता - Speciality of Nag Panchmi
 
 
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. पूर्ण श्रवण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता है. इसलिये इस दिन भूमि में हल चलाना, नींव खोदना शुभ नहीं माना जाता है. भूमि में नाग देवता का घर होना है.  भूमि के खोदने से नागों को कष्ट होने की की संभावनाएं बनती है.

नाग पंचमी के उपवास की विधि -  Nag Panchmi Upvas Vidhi
देश के कई स्थानों पर नाग पंचमी कृ्ष्ण पक्ष की पंचमी भी मनाई जाती है. नाग पंचमी में नाग देवताओं के लिये व्रत रखा जाता है. इस व्रत में पूरे दिन उपवास रख कर सूर्य अस्त होने के बाद नाग देवता की पूजा के लिये खीर के रुप में प्रसाद बनाया जाता है उस खीर को सबसे पहले नाग देवता की मूर्ति अथवा शिव मंदिर में जाकर भोग लगाया जाता है, उसके बाद इस खीर को प्रसाद के रुप में स्वयं ग्रहण किया जाता है. उपवास समाप्ति के भोजन में नमक व तले हुए भोजन का प्रयोग करना वर्जित होता है. इस दिन उपवास से संबन्धित सभी नियमों का पालन करना चाहिए.

दक्षिण भारत में नाग पंचमी का अलग रुप - Nag Panchmi in South India
भारत के दक्षिण क्षेत्रों में श्रवण, शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी में शुद्ध तेल से स्नान किया जाता है. तथा वहां अविवाहित कन्याएं उपवास रख, मनोवांछित जीवन साथी की प्राप्ति की कामना करती है.

नाग पंचमी में बासी भोजन ग्रहण करने का विधान
नाग पंचमी के दिन मात्र पूजा में प्रयोग होने वाला भोजन ही तैयार किया जाता है. बाकि भोजन एक दिन पहले ही बनाया जाता है. परिवार के जो सदस्य उपवास नहीं रखते है. उन्हें बासी भोजन ही ग्रहण करने के लिये दिया जाता है. खीर के अलावा चावल-सैवई ताजे भोजन में बनाये जाते है.

मुख्य द्वार पर नाग देवता की आकृ्ति पूजा - Nag Devda Puja on Nag Panchami
देश के कुछ भागों में 14 अगस्त नाग पंचमी के दिन उपवासक अपने घर की दहलीज के दोनों ओर गोबर से पांच सिर वाले नाग की आकृ्ति बनाते है. गोबर न मिलने पर गेरू का प्रयोग भी किया जा सकता है. इसके बाद नाग देवता को दूध, दुर्वा, कुशा, गन्ध, फूल, अक्षत, लड्डूओं सहित पूजा करके नाग स्त्रोत

या निम्न मंत्र का जाप किया जाता है.
" ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा"

इस मंत्र की तीन माला जाप करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. नाग देवता को चंदन की सुगंध विशेष प्रिय होती है. इसलिये पूजा में चंदन का प्रयोग करना चाहिए. इस दिन की पूजा में सफेद कमल का प्रयोग किया जाता है.  उपरोक्त मंत्र का जाप करने से "कालसर्प योग' दोष की शान्ति भी होती है.

मनसा देवी को प्रसन्न करना Worsipping of Godess Mansa Devi
उतरी भारत में श्रवण मास की नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है. देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये बंगाल, उडिसा और अन्य क्षेत्रों में मनसा देवी के दर्शन व उपासना का कार्य किया जाता है.

काल-सर्प योग की शान्ति - Kal Sarp Dosha Shanti Remedies
14 अगस्त 2010, शुक्ल पक्ष, श्रवण मास के दिन जिन व्यक्तियों की कुण्डली में "कालसर्प योग' बन रहा हों, उन्हें इस दोष की शान्ति के लिये उपरोक्त बताई गई विधि से उपवास व पूजा-उपासना करना, लाभकारी रहता है. काल सर्प योग से पीडिय व्यक्तियों को इस दिन नाग देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए.

नाग-पंचमी में क्या न करें
नाग देवता की पूजा उपासना के दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए. उपासक चाहें तो शिव लिंग को दूध स्नान करा सकते है. यह जानते हुए कि दूध पिलाना नागों की मृ्त्यु का कारण बनता है. ऎसे में उन्हें दूध मिलाना अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान होता है. इसलिये भूलकर भी ऎसी गलती करने से बचना चाहिए. इससे श्रद्धा व विश्वास के पर्व में जीव हत्या करने से बचा जा सकता है.
" ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा"

इस मंत्र की तीन माला जाप करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. नाग देवता को चंदन की सुगंध विशेष प्रिय होती है. इसलिये पूजा में चंदन का प्रयोग करना चाहिए. इस दिन की पूजा में सफेद कमल का प्रयोग किया जाता है.  उपरोक्त मंत्र का जाप करने से "कालसर्प योग' दोष की शान्ति भी होती है.

मनसा देवी को प्रसन्न करना Worsipping of Godess Mansa Devi
उतरी भारत में श्रवण मास की नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की पूजा करने का विधान भी है. देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये बंगाल, उडिसा और अन्य क्षेत्रों में मनसा देवी के दर्शन व उपासना का कार्य किया जाता है.

काल-सर्प योग की शान्ति - Kal Sarp Dosha Shanti Remedies
4 अगस्त 2011, शुक्ल पक्ष, श्रवण मास के दिन जिन व्यक्तियों की कुण्डली में "कालसर्प योग' बन रहा हों, उन्हें इस दोष की शान्ति के लिये उपरोक्त बताई गई विधि से उपवास व पूजा-उपासना करना, लाभकारी रहता है. काल सर्प योग से पीडिय व्यक्तियों को इस दिन नाग देवता की पूजा अवश्य करनी चाहिए.

नाग-पंचमी में क्या न करें
नाग देवता की पूजा उपासना के दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य नहीं करना चाहिए. उपासक चाहें तो शिव लिंग को दूध स्नान करा सकते है. यह जानते हुए कि दूध पिलाना नागों की मृ्त्यु का कारण बनता है. ऎसे में उन्हें दूध मिलाना अपने हाथों से अपने देवता की जान लेने के समान होता है. इसलिये भूलकर भी ऎसी गलती करने से बचना चाहिए. इससे श्रद्धा व विश्वास के पर्व में जीव हत्या करने से बचा जा सकता है.

नागपंचमी पूजा का विधान

नागपंचमी पूजा का विधान


इस दिन ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान कर घर के दरवाजे पर या पूजा के स्थान पर गोबर से नाग बनाया जाता है। दूध, दुबी, कुशा, चंदन, अक्षत, पुष्प आदि से नाग देवता की पूजा की जाती है लड्डू और मालपुआ का भोग बनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सर्प को दूध से स्नान कराने से सांप का भय नहीं रहता । 

मेरा कहना है कि जिनके कुंडली में कालसर्प का योग रहता है उसे विशेषकर इस दिन नागदेवता की पूजा करनी चाहिए। भारत के अलग=अलग प्रांत में इसे अलग=अलग तरह से मनाया जाता है। दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और बंगाल में इसे विशेष रूप से मनाया जाता है।

पश्चिम बंगाल और असम तथा उड़ीसा के कुछ भागों में इस दिन नागों की देवी मां मनसा की अराधना की जाती है। केरला के मंदिरों में इस दिन शेषनाग की विशेष पूजा अर्चना होती है।


इस दिन सरस्वती देवी की भी पूजा की जाती है और बौद्धिक कार्य किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर इस दिन घर की महिलाएं उपवास रखें और विधि विधान से नाग देवता की पूजा करें तो परिवार को सर्पदंश का भय नहीं रहता ।

 

Monday, August 1, 2011

शिव को प्रिय श्रावण मास

शिव को प्रिय श्रावण मास


पद्म पुराण के पाताल खंड के अष्टम अध्याय में ज्योतिर्लिंगों के बारे में कहा गया है कि जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उनकी समस्त कामनाओं की इच्छा पूर्ति होती है। स्वर्ग और मोक्ष का वैभव जिनकी कृपा से प्राप्त होता है।

शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की नगरी का भार है। पुराणों में ऐसा वर्णित है कि प्रलय आने पर भी काशी को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी।

भारत में शिव संबंधी अनेक पर्व तथा उत्सव मनाए जाते हैं। उनमें श्रावण मास भी अपना विशेष महत्व रखता है। संपूर्ण महीने में चार सोमवार, एक प्रदोष तथा एक शिवरात्रि, ये योग एकसाथ श्रावण महीने में मिलते हैं। इसलिए श्रावण का महीना अधिक फल देने वाला होता है। इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ाई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :

प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।

महिलाएँ श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना एवं व्रत अपने पति की लंबी आयु के लिए करती हैं। सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण, कार्तिक और माघ मास में किसी भी सोमवार को प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति सत्रहवें सोमवार को सोलह दम्पति (जो़ड़ों) को भोजन एवं किसी वस्तु का दान देकर उद्यापन किया जाता है।

शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।

शिव का ग्यारहवाँ अवतार हनुमान के रूप में हुआ है। संपूर्ण श्रावणमास में शिव भक्तों द्वारा शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप किया जाता है। श्रावण मास में इसके करने से अधिक फल प्राप्त होता है।

श्रावण मास : भगवान भोले नाथ की आराधना

राशि अनुसार ऐसे करें श्रावण में भगवान भोले नाथ की आराधना

मेष राशि:- अगर आपके पारिवारिक जीवन में समस्या है, दांपत्य सुख नहीं हैं, आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है तो श्रावण मास में हर रोज बेलपत्र पर लाल चंदन से नम: शिवाय लिखें। इसी मंत्र का जाप करते हुए जलाभिषेक करें। तत्पश्चात यह बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित कर दें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

वृषभ राशि:- वृषभ राशि वाले कार्य सिद्धि व लाभ प्राप्ति के लिए नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत सर्वप्रथम शिवलिंग गंगाजल और दही से अभिषेक करें। उसके बाद कच्चा दूध चढ़ाएं। तत्पश्चात जल की धारा के साथ द्वादश ज्योर्तिलिंगों के मंत्रों का उच्चारण करें। शिवलिंग पर श्वेत चंदन से तिलक करें और हारसिंगार के पुष्प अर्पित करें।

मिथुन राशि:- मिथुन राशि का स्वामी बुध और चंद्रमा के हमेशा आपस बैर रहा है। यदि आपकी जन्मकुंडली में चंद्रमा कमजोर है। आपकी मानसिक अवस्था अस्थिर रहती है। कारोबारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, कारोबार में बचत नहीं हो रही है तो श्रावण महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत ऊँ नम: शिवाय का जाप करते हुए गंगाजल में श्रद्धानुसार शहद मिलाकर अभिषेक करें।

कर्क राशि:- कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा जो भगवान शिव का प्रिय श्रृंगार हैं। जीवन में कोई भी समस्या हो उन समस्याओं के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत गंगाजल, दूध व मिश्री मिलाकर ऊँ चंद्र मोलेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

सिंह राशि:- सिंह राशि वाले लोग शत्रु संबंधी समस्या का निवारण, वर्चस्व प्राप्ति, कारोबार में लाभ प्राप्ति एवं पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत श्रद्धानुसार शुद्ध देसी घी से ऊँ  अनंनताय नम: मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव के शिवलिंग पर अभिषेक करें।

कन्या राशि:- कन्या राशि वाले लोग व्यवसाय में हानि से बचने, नौकार में सफलता पाने व पारिवारिक सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत ऊँ त्रिमूर्तितेय नम: मंत्र का जाप करते हुए दूध, घी और शहद से अभिषेक करें। 

तुला राशि:- तुला राशि वाले लोग दांपत्य सुख, व्यवसाय वृद्धि एवं संतान सुख के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत दही और गन्ने के रस से शिवलिंग पर ऊँ श्री कंठाय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

वृश्चिक राशि:- वृश्चिक राशि वाले अपनी जीवन की संपूर्ण सफलता के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत तीर्थ स्थान के जल में दूध और शक्कर मिलाकर ऊँ नम: शिवाय कालं महाकाल कालं कृपालं ऊं नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

धनु राशि:- धनु राशि वाले मनोवांछित सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत गंगा जल, कच्चे दूध व केसर मिलाकर ऊँ महेश्वराय नम: इस मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

मकर राशि:- मकर राशि वाले व्यवसाय में सफलता, पारिवारिक जीवन सुख व मनोनुकूल कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत बादाम के तेल से ऊँ सर्वभूतहराय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

कुंभ राशि:- कुंभ राशि वाले लोग परिवार में कष्ट हो, कारोबार में हानि हो, शारिरिक परेशानियों के निवारण हेतु श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत घी, शहद और शक्कर से ऊँ अव्यक्ताय नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।

 मीन राशि:- मीन राशि वाले संपूर्ण विघ् और परेशानियों के निवारण के लिए श्रावण के महीने में हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत कच्चे दूध, केसर और तीर्थ जल मिलाकर ऊँ सर्वलोक प्रजापतये नम: मंत्र का जाप करते हुए अभिषेक करें।
  

Saturday, July 16, 2011

Shravan Maas 2011: श्रावण शिवाराधन

 Shavan Maas : Sat,16 July 2011 to Sat,13 August 2011

First Monday : 18 July 2011

The month of Shravan is the fifth month of the Hindu calender beginning from Chaitra, and is the most auspicious month of the Chaturmas. On Purnima or fullmoon day, or during the course of the month the star ‘Shravan’ rules the sky, hence the month is called Shavan. This month is spread out with innumerably religious festivals and ceremonies and almost all the days of this month are auspicious.

Shravan Month श्रावण मासमें आशुतोष भगवान्‌ शंकरकी पूजाका विशेष महत्व है। जो प्रतिदिन पूजन न कर सकें उन्हें सोमवारको शिवपूजा अवश्य करनी चाहिये और व्रत रखना चाहिये। सोमवार भगवान्‌ शंकरका प्रिय दिन है, अत: सोमवारको शिवाराधन करना चाहिये।
श्रावणमें पार्थिव शिवपूजाका विशेष महत्व है। अत: प्रतिदिन अथवा प्रति सोमवार तथा प्रदोषको शिवपूजा या पार्थिव शिवपूजा अवश्य करनी चाहिये।

सोमवार (Shravan Somvar) के व्रत के दिन प्रातःकाल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर देवालय या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव-पार्वती और नंदी की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रूप में जल  ,  दूध  ,  दही  ,  शहद  ,  घी  ,  चीनी  ,  जने‌ऊ  ,  चंदन  ,  रोली  ,  बेल पत्र  ,  भांग  ,  धतूरा  ,  धूप  ,  दीप और दक्षिणा के साथ ही नंदी के लि‌ए चारा या आटे की पिन्नी बनाकर भगवान पशुपतिनाथ का पूजन किया जाता है। रात्रिकाल में घी और कपूर सहित गुगल, धूप की आरती करके शिव महिमा का गुणगान किया जाता है। लगभग श्रावण मास के सभी सोमवारों को यही प्रक्रिया अपना‌ई जाती है।

इस मासमें लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ करानेका भी विधान है।
इस मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर शिवामूठ च़ढ़ा‌ई जाती है। वह क्रमशः इस प्रकार है :
प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी, दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी, तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी, चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी और यदि पाँचवाँ सोमवार आ‌ए तो एक मुट्ठी सत्तू च़ढ़ाया जाता है।


शिव की पूजा में बिल्वपत्र (Belpatra) अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।
एक कथा के अनुसार श्रीविष्णु पत्नी लक्ष्मी ने शंकर के प्रिय श्रावण माह में शिवलिंग पर प्रतिदिन 1001 सफेद कमल अर्पण करने का निश्चय किया। स्वर्ण तश्तरी में उन्होंने गिनती के कमल रखे, लेकिन मंदिर पहुँचने पर तीन कमल अपने आप कम हो जाते थे। सो मंदिर पहुँचकर उन्होंने उन कमलों पर जल छींटा, तब उसमें से एक पौधे का निर्माण हु‌आ। इस पर त्रिदल ऐसे हजारों पत्ते थे, जिन्हें तोड़कर लक्ष्मी शिवलिंग पर चढ़ाने लगीं, सो त्रिदल के कम होने का तो सवाल ही खत्म हो गया।
और लक्ष्मी ने भक्ति के सामर्थ्य पर निर्माण कि‌ए बिल्वपत्र शिव को प्रिय हो ग‌ए। लक्ष्मी यानी धन-वैभव, जो कभी बासी नहीं होता। यही वजह है कि लक्ष्मी द्वारा पैदा किया गया बिल्वपत्र भी वैसा ही है। ताजा बिल्वपत्र न मिलने की दशा में शिव को अर्पित बिल्वपत्र पुनः चढ़ाया जा सकता है। बिल्वपत्र का वृक्ष प्रकृति का मनुष्य को दिया वरदान है।
सुहागन स्त्रियों को इस दिन व्रत रखने से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। विद्यार्थियों को सोमवार का व्रत रखने से और शिव मंदिर में जलाभिषेक करने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है। बेरोजगार और अकर्मण्य जातकों को रोजगार तथा काम मिलने से मानप्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। सदगृहस्थ नौकरी पेशा या व्यापारी को श्रावण के सोमवार व्रत करने से धन धान्य और लक्ष्मी की वृद्धि होती है।

वहीं भगवान श्री कृष्‍ण के वृन्‍दावन में भी सावन के महीने में बहारें छायीं रहेंगीं, जहॉं झूलों और रास लीला‌ओं का परम्‍परागत उत्‍सव रहेगा वहीं कृष्‍ण साधना और कृष्‍ण पूजा भी इन दिनों भारी संख्‍या में होगी ।
सावन (shavan) के पूरे महीने जहॉं शिव और कृष्‍ण की पूजा और साधना परम्‍परा चलेगी वहीं शिवालय और कृष्‍ण मन्दिर इन दिनों लोगों के मेलों से घिरे रहेंगे ।

आज भी उत्तर भारत में कांवड़ परम्परा का बोलबाला है। श्रद्धालु गंगाजल लाने के लि‌ए हरिद्वार  ,  गढ़ गंगा और प्रयाग जैसे तीर्थो में जाकर जलाभिषेक करने हेतु कांवड़ लेकर आते हैं। यह सब साधन शिवजी की कृपा प्राप्त करने के लि‌ए है।

Thursday, July 14, 2011

Guru Purnima or Vyasa Purnima 2011




Guru Purnima (Guru Purṇima, sanskrit: गुरु पूर्णिमा) is a special day in the year when every sincere devotee offers puja (worship) to his Gurudeva.

On Guru Purnima we mostly do puja / devote to Sai Baba (Shridi) and Dattatre.

Guru Purnima
Guru Purnima is on the day of full moon, Purnima, in the month of Ashadh of the Hindu calendar.
Vyasa Purnima or Guru Purnima is celebrated in memory of the birth of Maharishi Veda Vyasa. In 2011, Vyasa Purnima is observed on 15th July 2011, Friday. Veda Vyasa is the great rishi who is the author of the four Vedas (Rig Veda, Yajur Veda, Sama Veda, and Atharva Veda), and the author of Brahma Sutras and the 18 Puranas. Sage Vyas is regarded as the highest Guru in the Hindu traditions and hence the Vyasa Poornima is celebrated as Guru Purnima by all Hindus. Special poojas and rituals are celebrated in Hindu temples on Veda Vyasa Purnima 2011.

Another Hindu festival dedicated to Maharishi Vyasa is Veda Vyasa Jayanti. In 2011, Vedavyasa Jayanti is on 5th April 2011.

Vaishnavas considered Veda Vyas as an incarnation of Lord Vishnu and hence make it a point to visit Lord Vishnu Temples and worship Maha Vishnu.

When Vyasa was born
This was the day when Krishna-dwaipayana Vyasa – author of the Mahabharata – was born. Veda Vyasa did yeoman service to the cause of Vedic studies by gathering all the Vedic hymns extant during his times, dividing them into four parts based on their use in the sacrificial rites, and teaching them to his four chief disciples – Paila, Vaisampayana, Jaimini and Sumantu.

It was this dividing and editing that earned him the honorific "Vyasa" (vyas = to edit, to divide).

He divided the Veda into four, namely Rig, Yajur, Sama and Atharva.
The histories and the Puranas are said to be the fifth Veda - Brahmanda Purana.

The spiritual Gurus are revered on this day by remembering their life and teachings.

Guru Purnima calendar:
Year Guru Purnima date
2011 15 July 2011


What is Guru Purnima?
The full moon day in the Hindu month of Ashad (July-August) is observed as the auspicious day of Guru Purnima, a day sacred to the memory of the great sage Vyasa. Every Hindu, as every sincere seeker in the world, is indebted to this ancient seer who edited the four Vedas, wrote the 18 Puranas, the Mahabharata and the Srimad Bhagavata. Vyasa even taught Dattatreya, who is regarded as the Guru of Gurus.

Significance of Guru Purnima
On this day, every spiritual aspirant and devotee worship Vyasa in honor of his divine personage and every disciple performs a Puja to his respective spiritual preceptor, or Gurudeva, with sacred songs, hymns, meditation and joyful events.

Every spiritual seeker and devotee worship his Gurudeva and, praying to him as God's direct representative on earth, soulfully offers him his devotion in the form of flowers, fruits, and other offerings.

Performing this puja in the evening is considered more appropriate. However one can do it in the morning as well. On the day of the puja, the devotee is supposed to fast. After bathing the person can begin the puja.

This day is also of deep significance to the farmers, for it heralds the setting in of the rains. Traditionally it is said to be a good time to begin your spiritual lessons, and spiritual seekers commence to intensify their spiritual sadhana from this day.

The period Chaturmas ("four months") begins from this day. In the past, wandering spiritual masters and their disciples used to settle down at a place to study and discourse on the Brahma Sutras composed by Vyasa, and engage themselves in Vedantic discussions.


How to Observe Guru Purnima

1.) All aspirants awake at Brahmamuhurta, at 4 o'clock. They meditate on the Guru and chant his prayers.
2.) Later in the day, the sacred worship of the Guru's Feet is performed. Of this worship it is said in the Guru Gita:

Dhyana mulam guror murti;
Puja mulam guroh padam;
Mantra mulam guror vakyam;
Moksha mulam guroh kripa.

Freely translated:
The Guru's form should be meditated upon;
The feet of the Guru should be worshipped;
His words are to be treated as a sacred Mantra;
His Grace ensures final liberation.

3.) Sadhus and Sannyasins are then worshipped and fed at noon.
4.) There is continuous Satsang during which discourses are held on the glory of devotion to the Guru in particular, and on spiritual topics in general.
5.) Deserving aspirants are initiated into the Holy Order of Sannyas, as this is a highly auspicious occasion.
6.) Devout disciples fast and spend the whole day in prayer. They also take fresh resolves for spiritual progress.

Advice from a Guru

Wake up at Brahmamuhurta (at 4 a.m.) on this most holy day. Meditate on the lotus feet of your Guru. Mentally pray to him for his Grace, through which alone you can attain Self-realisation. Do vigorous Japa and meditate in the early morning hours.

After bath, worship the lotus feet of your Guru, or his image or picture with flowers, fruits, incense and camphor. Fast or take only milk and fruits the whole day. In the afternoon, sit with other devotees of your Guru and discuss with them the glories and teachings of your Guru.

Alternatively, you may observe the vow of silence and study the books or writings of your Guru, or mentally reflect upon his teachings. Take fresh resolves on this holy day, to tread the spiritual path in accordance with the precepts of your Guru.

At night, assemble again with other devotees, and sing the Names of the Lord and the glories of your Guru. The best form of worship of the Guru is to follow his teachings, to shine as the very embodiment of his teachings, and to propagate his glory and his message.

“Gurur Brahma Gurur Vishnu Guru Devo Maheswara;
Gurur Sakshat Para Brahma Thasmai Sri Gurave Namaha“

So Guru Poornima is a grate day for priest and students to worship their guru and get blessings for their successful Future.

In year 2011 Guru Poornima festival will be celebrated on 15 July with great pleasure because it’s significant for Hindu religion. This will be day to worship our guru (The Teacher) with our god because Guru is like God.

In My way of thinking our life first guru is our Parents because first they only teach us and polished our knowledge. so first we should worship our parents on Guru Purnima.

Let us all pray to Veda Vyasa on Vyas Purnima with the small stotra taken from Vishnu Sahasranama Stotram

Vyasam Vasishtanaptharam, Sakthe Poutramakalmasham,
Parasarathmajam vande, Shukathatham Taponidhim

Vyasaya Vishnu Roopaya, Vyasa Roopaya Vishnave,
Namo Vai Brahma Vidaya, Vasishtaya Namo Nama.

The meaning on the Stotra is

I bow before you Vyasa,
The treasure house of penance,
The great grand son of Vasishta.
The grand son of Shakthi,
The son of Parasara.
And the father of Shuka,

Bow I before,
Vyasa who is Vishnu,
Vishnu who is Vyasa,
And again and again bow before,
He, who is born,
In the family of Vasishta.

!! Wish you all and to all the Guru's a Happy Guru Pornima !!

From,
Kalpesh Dave

Tuesday, July 12, 2011

Monday, July 11, 2011

रोग नाशक देवी मन्त्र - Cure Diseases through Devi Mantra

रोग नाशक देवी मन्त्र -  Cure Diseases through Devi Mantra

“ॐ उं उमा-देवीभ्यां नमः”
‘Om um uma-devibhyaM namah’
इस मन्त्र से मस्तक-शूल (headache) तथा मज्जा-तन्तुओं (Nerve Fibres) की समस्त विकृतियाँ दूर होती है – ‘पागल-पन’(Insanity, Frenzy, Psychosis, Derangement, Dementia, Eccentricity)तथा ‘हिस्टीरिया’ (hysteria) पर भी इसका प्रभाव पड़ता है ।

“ॐ यं यम-घण्टाभ्यां नमः”
‘Om yaM yam-ghantabhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘नासिका’ (Nose) के विकार दूर होते हैं ।

“ॐ शां शांखिनीभ्यां नमः”
‘Om shaM shankhinibhyaM namah”
इस मन्त्र से आँखों के विकार (Eyes disease) दूर होते हैं । सूर्योदय से पूर्व इस मन्त्र से अभिमन्त्रित रक्त-पुष्प से आँख झाड़ने से ‘फूला’ आदि विकार नष्ट होते हैं ।

“ॐ द्वां द्वार-वासिनीभ्यां नमः”
‘Om dwaM dwar-vasineebhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त ‘कर्ण-विकार’ (Ear disease) दूर होते हैं ।

“ॐ चिं चित्र-घण्टाभ्यां नमः”
‘Om chiM chitra-ghantabhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘कण्ठमाला’ तथा कण्ठ-गत विकार दूर होते हैं ।

“ॐ सं सर्व-मंगलाभ्यां नमः”
‘Om saM sarva-mangalabhyaM namah’
इस मन्त्र से जिह्वा-विकार (tongue disorder) दूर होते हैं । तुतलाकर बोलने वालों (Lisper) या हकलाने वालों (stammering) के लिए यह मन्त्र बहुत लाभदायक है ।

“ॐ धं धनुर्धारिभ्यां नमः”
‘Om dhaM dhanurdharibhyaM namah’
इस मन्त्र से पीठ की रीढ़ (Spinal) के विकार (backache) दूर होते है । This is also useful for Tetanus.

“ॐ मं महा-देवीभ्यां नमः”
‘Om mM mahadevibhyaM namah’
इस मन्त्र से माताओं के स्तन विकार अच्छे होते हैं । कागज पर लिखकर बालक के गले में बाँधने से नजर, चिड़चिड़ापन आदि दोष-विकार दूर होते हैं ।

“ॐ शों शोक-विनाशिनीभ्यां नमः”
‘Om ShoM Shok-vinashineebhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त मानसिक व्याधियाँ नष्ट होती है । ‘मृत्यु-भय’ दूर होता है । पति-पत्नी का कलह-विग्रह रुकता है । इस मन्त्र को साध्य के नाम के साथ मंगलवार के दिन अनार की कलम से रक्त-चन्दन से भोज-पत्र पर लिखकर, शहद में डुबो कर रखे । मन्त्र के साथ जिसका नाम लिखा होगा, उसका क्रोध शान्त होगा ।

“ॐ लं ललिता-देवीभ्यां नमः”
‘Om laM lalita-devibhyaM namah’
इस मन्त्र से हृदय-विकार (Heart disease) दूर होते हैं ।

“ॐ शूं शूल-वारिणीभ्यां नमः”
‘Om shooM shool-vaarineebhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘उदरस्थ व्याधियों’ (Abdominal) पर नियन्त्रण होता है । प्रसव-वेदना के समय भी मन्त्र को उपयोग में लिया जा सकता है ।

“ॐ कां काल-रात्रीभ्यां नमः”
‘Om kaaM kaal-raatribhyaM namah’
इस मन्त्र से आँतों (Intestine) के समस्त विकार दूर होते हैं । विशेषतः ‘अक्सर’, ‘आमांश’ आदि विकार पर यह लाभकारी है ।

“ॐ वं वज्र-हस्ताभ्यां नमः”
‘Om vaM vajra-hastabhyaM namah’
इस मन्त्र से समस्त ‘वायु-विकार’ दूर होते हैं । ‘ब्लड-प्रेशर’ के रोगी के रोगी इसका उपयोग करें ।

“ॐ कौं कौमारीभ्यां नमः”

‘Om kauM kaumareebhyaM namah’
इस मन्त्र से दन्त-विकार (Teeth disease) दूर होते हैं । बच्चों के दाँत निकलने के समय यह मन्त्र लाभकारी है ।

“ॐ गुं गुह्येश्वरी नमः”
‘Om guM guhyeshvari namah’
इस मन्त्र से गुप्त-विकार दूर होते हैं । शौच-शुद्धि से पूर्व, बवासीर के रोगी १०८ बार इस मन्त्र का जप करें । सभी प्रकार के प्रमेह – विकार भी इस मन्त्र से अच्छे होते हैं ।

“ॐ पां पार्वतीभ्यां नमः”
‘Om paaM paarvatibhyaM namah’
इस मन्त्र से ‘रक्त-मज्जा-अस्थि-गत विकार’ दूर होते हैं । कुष्ठ-रोगी इस मन्त्र का प्रयोग करें ।

“ॐ मुं मुकुटेश्वरीभ्यां नमः”
‘Om muM mukuteshvareebhyaM namah’
इस मन्त्र से पित्त-विकार दूर होते हैं । अम्ल-पित्त के रोगी इस मन्त्र का उपयोग करें ।

“ॐ पं पद्मावतीभ्यां नमः”

‘Om paM padmavateebhyaM namah’
इस मन्त्र से कफज व्याधियों पर नियन्त्रण होता है ।
विधिः- उपर्युक्त मन्त्रों को सर्व-प्रथम किसी पर्व-काल में १००८ बार जप कर सिद्ध कर लेना चाहिये । फिर प्रतिदिन जब तक विकार रहे, १०८ बार जप करें अथवा सुविधानुसार अधिक-से-अधिक जप करें । विकार दूर होने पर ‘कुमारी-पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि करें ।


shree Tripur Bhairavi kavach - श्री त्रिपुर भैरवी कवचम्

Shree Tripur Bhairavi kavach


श्री त्रिपुर भैरवी कवचम्
 
।। श्रीपार्वत्युवाच ।।
देव-देव महा-देव, सर्व-शास्त्र-विशारद ! कृपां कुरु जगन्नाथ ! धर्मज्ञोऽसि महा-मते ! ।
भैरवी या पुरा प्रोक्ता, विद्या त्रिपुर-पूर्विका । तस्यास्तु कवचं दिव्यं, मह्यं कफय तत्त्वतः ।
तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा, जगाद् जगदीश्वरः । अद्भुतं कवचं देव्या, भैरव्या दिव्य-रुपि वै ।
 

।। ईश्वर उवाच ।।
कथयामि महा-विद्या-कवचं सर्व-दुर्लभम् । श्रृणुष्व त्वं च विधिना, श्रुत्वा गोप्यं तवापि तत् ।
यस्याः प्रसादात् सकलं, बिभर्मि भुवन-त्रयम् । यस्याः सर्वं समुत्पन्नं, यस्यामद्यादि तिष्ठति ।
माता-पिता जगद्-धन्या, जगद्-ब्रह्म-स्वरुपिणी । सिद्धिदात्री च सिद्धास्या, ह्यसिद्धा दुष्टजन्तुषु ।
सर्व-भूत-प्रियङ्करी, सर्व-भूत-स्वरुपिणी । ककारी पातु मां देवी, कामिनी काम-दायिनी ।
एकारी पातु मां देवी, मूलाधार-स्वरुपिणी । ईकारी पातु मां देवी, भूरि-सर्व-सुख-प्रदा ।
लकारी पातु मां देवी, इन्द्राणी-वर-वल्लभा । ह्रीं-कारी पातु मां देवी, सर्वदा शम्भु-सु्न्दरी ।
एतैर्वर्णैर्महा-माया, शाम्भवी पातु मस्तकम् । ककारे पातु मां देवी, शर्वाणी हर-गेहिनी ।
मकारे पातु मां देवी, सर्व-पाप-प्रणाशिनी । ककारे पातु मां देवी, काम-रुप-धरा सदा ।
ककारे पातु मां देवी, शम्बरारि-प्रिया सदा । पकारे पातु मां देवी, धरा-धरणि-रुप-धृक् ।
ह्रीं-कारी पातु मां देवी, अकारार्द्ध-शरीरिणी । एतैर्वर्णैर्महा-माया, काम-राहु-प्रियाऽवतु ।
मकारः पातु मां देवी ! सावित्री सर्व-दायिनी । ककारः पातु सर्वत्र, कलाम्बर-स्वरुपिणी ।
लकारः पातु मां देवी, लक्ष्मीः सर्व-सुलक्षणा । ह्रीं पातु मां तु सर्वत्र, देवी त्रि-भुवनेश्वरी ।
एतैर्वर्णैर्महा-माया, पातु शक्ति-स्वरुपिणी । वाग्-भवं मस्तकं पातु, वदनं काम-राजिका ।
शक्ति-स्वरुपिणी पातु, हृदयं यन्त्र-सिद्धिदा । सुन्दरी सर्वदा पातु, सुन्दरी परि-रक्षतु ।
रक्त-वर्णा सदा पातु, सुन्दरी सर्व-दायिनी । नानालङ्कार-संयुक्ता, सुन्दरी पातु सर्वदा ।
सर्वाङ्ग-सुन्दरी पातु, सर्वत्र शिव-दायिनी । जगदाह्लाद-जननी, शम्भु-रुपा च मां सदा ।
सर्व-मन्त्र-मयी पातु, सर्व-सौभाग्य-दायिनी । सर्व-लक्ष्मी-मयी देवी, परमानन्द-दायिनी ।
पातु मां सर्वदा देवी, नाना-शङ्ख-निधिः शिवा । पातु पद्म-निधिर्देवी, सर्वदा शिव-दायिनी ।
दक्षिणामूर्तिर्मां पातु, ऋषिः सर्वत्र मस्तके । पंक्तिशऽछन्दः-स्वरुपा तु, मुखे पातु सुरेश्वरी ।
गन्धाष्टकात्मिका पातु, हृदयं शाङ्करी सदा । सर्व-सम्मोहिनी पातु, पातु संक्षोभिणी सदा ।
सर्व-सिद्धि-प्रदा पातु, सर्वाकर्षण-कारिणी । क्षोभिणी सर्वदा पातु, वशिनी सर्वदाऽवतु ।
आकर्षणी सदा पातु, सम्मोहिनी सर्वदाऽवतु । रतिर्देवी सदा पातु, भगाङ्गा सर्वदाऽवतु ।
माहेश्वरी सदा पातु, कौमारी सदाऽवतु । सर्वाह्लादन-करी मां, पातु सर्व-वशङ्करी ।
क्षेमङ्करी सदा पातु, सर्वाङ्ग-सुन्दरी तथा । सर्वाङ्ग-युवतिः सर्वं, सर्व-सौभाग्य-दायिनी ।
वाग्-देवी सर्वदा पातु, वाणिनी सर्वदाऽवतु । वशिनी सर्वदा पातु, महा-सिद्धि-प्रदा सदा ।
सर्व-विद्राविणी पातु, गण-नाथः सदाऽवतु । दुर्गा देवी सदा पातु, वटुकः सर्वदाऽवतु ।
क्षेत्र-पालः सदा पातु, पातु चावीर-शान्तिका । अनन्तः सर्वदा पातु, वराहः सर्वदाऽवतु ।
पृथिवी सर्वदा पातु, स्वर्ण-सिंहासनं तथा । रक्तामृतं च सततं, पातु मां सर्व-कालतः ।
सुरार्णवः सदा पातु, कल्प-वृक्षः सदाऽवतु । श्वेतच्छत्रं सदा पातु, रक्त-दीपः सदाऽवतु ।
नन्दनोद्यानं सततं, पातु मां सर्व-सिद्धये । दिक्-पालाः सर्वदा पान्तु, द्वन्द्वौघाः सकलास्तथा ।
वाहनानि सदा पान्तु, अस्त्राणि पान्तु सर्वदा । शस्त्राणि सर्वदा पान्तु, योगिन्यः पान्तु सर्वदा ।
सिद्धा सदा देवी, सर्व-सिद्धि-प्रदाऽवतु । सर्वाङ्ग-सुन्दरी देवी, सर्वदा पातु मां तथा ।
आनन्द-रुपिणी देवी, चित्-स्वरुपां चिदात्मिका । सर्वदा सुन्दरी पातु, सुन्दरी भव-सुन्दरी ।
पृथग् देवालये घोरे, सङ्कटे दुर्गमे गिरौ । अरण्ये प्रान्तरे वाऽपि, पातु मां सुन्दरी सदा ।
 

।। फल-श्रुति ।।
इदं कवचमित्युक्तो, मन्त्रोद्धारश्च पार्वति ! य पठेत् प्रयतो भूत्वा, त्रि-सन्ध्यं नियतः शुचिः ।
तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः स्याद्, यद्यन्मनसि वर्तते । गोरोचना-कुंकुमेन, रक्त-चन्दनेन वा ।
स्वयम्भू-कुसुमैः शुक्लैर्भूमि-पुत्रे शनौ सुरै । श्मशाने प्रान्तरे वाऽपि, शून्यागारे शिवालये ।
स्व-शक्त्या गुरुणा मन्त्रं, पूजयित्वा कुमारिकाः । तन्मनुं पूजयित्वा च, गुरु-पंक्तिं तथैव च ।
देव्यै बलिं निवेद्याथ, नर-मार्जार-शूकरैः । नकुलैर्महिषैर्मेषैः, पूजयित्वा विधानतः ।
धृत्वा सुवर्ण-मध्यस्थं, कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । सु-तिथौ शुभ-नक्षत्रे, सूर्यस्योदयने तथा ।
धारयित्वा च कवचं, सर्व-सिद्धिं लभेन्नरः ।
कवचस्य च माहात्म्यं, नाहं वर्ष-शतैरपि । शक्नोमि तु महेशानि ! वक्तुं तस्य फलं तु यत् ।
न दुर्भिक्ष-फलं तत्र, न चापि पीडनं तथा । सर्व-विघ्न-प्रशमनं, सर्व-व्याधि-विनाशनम् ।
सर्व-रक्षा-करं जन्तोः, चतुर्वर्ग-फल-प्रदम्, मन्त्रं प्राप्य विधानेन, पूजयेत् सततः सुधीः ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये, कवचं देव-रुपिणम् ।
गुरोः प्रसादमासाद्य, विद्यां प्राप्य सुगोपिताम् । तत्रापि कवचं दिव्यं, दुर्लभं भुवन-त्रयेऽपि ।
श्लोकं वास्तवमेकं वा, यः पठेत् प्रयतः शुचिः । तस्य सर्वार्थ-सिद्धिः, स्याच्छङ्करेण प्रभाषितम् ।
गुरुर्देवो हरः साक्षात्, पत्नी तस्य च पार्वती । अभेदेन यजेद् यस्तु, तस्य सिद्धिरदूरतः ।

।। इति श्री रुद्र-यामले भैरव-भैरवी-सम्वादे-श्रीत्रिपुर-भैरवी-कवचं सम्पूर्णम् ।।

Sunday, July 10, 2011

मनोवांछित वर-प्राप्ति प्रयोग - Manpasand Pati Prapti ke Prayog (shaadi, Marriage)

मनोवांछित वर-प्राप्ति प्रयोग


१॰ भगवती सीता ने गौरी की उपासना निम्न मन्त्र द्वारा की थी, जिसके फलस्वरुप उनका विवाह भगवान् श्रीराम से हुआ। अतः कुमारी कन्याओं को मनोवाञ्छित वर पाने के लिये इसका पाठ करना चाहिए।
“ॐ श्रीदुर्गायै सर्व-विघ्न-विनाशिन्यै नमः स्वाहा। सर्व-मङ्गल-मङ्गल्ये, सर्व-काम-प्रदे देवि, देहि मे वाञ्छितं नित्यं, नमस्ते शंकर-प्रिये।। दुर्गे शिवेऽभये माये, नारायणि सनातनि, जपे मे मङ्गले देहि, नमस्ते सर्व-मङ्गले।।”

विधि- प्रतिदिन माँ गौरी का स्मरण-पूजन कर ११ पाठ करे।

२॰ कन्याओं के विवाहार्थ अनुभूत प्रयोग
इसका प्रयोग द्वापर में गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति-रुप में प्राप्त करने के लिए किया था। ‘नन्द-गोप-सुतं देवि’ पद को आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे- ‘अमुक-सुतं अमुकं देवि’।
“कात्यायनि महा-माये महा-योगिन्यधीश्वरि।
नन्द-गोप-सुतं देवि, पतिं मे कुरु ते नमः।”
विधि- भगवती कात्यायनी का पञ्चोपचार (१ गन्ध-अक्षत २ पुष्प ३ धूप ४ दीप ५ नैवेद्य) से पूजन करके उपर्युक्त मन्त्र का १०,००० (दस हजार) जप तथा दशांश हवन, तर्पण तथा कन्या भोजन कराने से कुमारियाँ इच्छित वर प्राप्त कर सकती है।

३॰. लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।

४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।

५॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”

६॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।

७॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।

८॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।

९॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।

१०॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।

११॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेक युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्याम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”

१२॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नहर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।

१३॰ पति-स्तवनम्
नमः कान्ताय सद्-भर्त्रे, शिरश्छत्र-स्वरुपिणे।
नमो यावत् सौख्यदाय, सर्व-सेव-मयाय च।।
नमो ब्रह्म-स्वरुपाय, सती-सत्योद्-भवाय च।
नमस्याय प्रपूज्याय, हृदाधाराय ते नमः।।
सती-प्राण-स्वरुपाय, सौभाग्य-श्री-प्रदाय च।
पत्नीनां परनानन्द-स्वरुपिणे च ते नमः।।
पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः, पतिरेव महेश्वरः।
पतिर्वंश-धरो देवो, ब्रह्मात्मने च ते नमः।।
क्षमस्व भगवन् दोषान्, ज्ञानाज्ञान-विधापितान्।
पत्नी-बन्धो, दया-सिन्धो दासी-दोषान् क्षमस्व वै।।
।।फल-श्रुति।।
स्तोत्रमिदं महालक्ष्मि, सर्वेप्सित-फल-प्रदम्।
पतिव्रतानां सर्वासाण, स्तोत्रमेतच्छुभावहम्।।
नरो नारी श्रृणुयाच्चेल्लभते सर्व-वाञ्छितम्।
अपुत्रा लभते पुत्रं, निर्धना लभते ध्रुवम्।।
रोगिणी रोग-मुक्ता स्यात्, पति-हीना पतिं लभेत्।
पतिव्रता पतिं स्तुत्वा, तीर्थ-स्नान-फलं लभेत्।।
विधिः-
१॰ पतिव्रता नारी प्रातः-काल उठकर, रात्रि के वस्त्रों को त्याग कर, प्रसन्नता-पूर्वक उक्त स्तोत्र का पाठ करे। फिर घर के सभी कामों से निबट कर, स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर, भक्ति-पूर्वक पति को सुगन्धित जल से स्नान करा कर शुक्ल वस्त्र पहनावे। फिर आसन पर उन्हें बिठाकर मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाए, सर्वांग में गन्ध का लेप कर, कण्ठ में पुष्पों की माला पहनाए। तब धूप-दीप अर्पित कर, भोजन कराकर, ताम्बूल अर्पित कर, पति को श्रीकृष्ण या श्रीशिव-स्वरुप मानकर स्तोत्र का पाठ करे।
२॰ कुमारियाँ श्रीकृष्ण, श्रीविष्णु, श्रीशिव या अन्य किन्हीं इष्ट-देवता का पूजन कर उक्त स्तोत्र के नियमित पाठ द्वारा मनो-वाञ्छित पति पा सकती है।

३॰ प्रणय सम्बन्धों में माता-पिता या अन्य लोगों द्वारा बाधा डालने की स्थिति में उक्त स्तोत्र पाठ कर कोई भी दुखी स्त्री अपनी कामना पूर्ण कर सकती है।

४॰ उक्त स्तोत्र का पाठ केवल स्त्रियों को करना चाहिए। पुरुषों को ‘विरह-ज्वर-विनाशक, ब्रह्म-शक्ति-स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए, जिससे पत्नी का सुख प्राप्त हो सकेगा।